गन्ना और दुग्ध उत्पादक किसानों के लिए संकट की घड़ी

बिजनेस स्टैंडर्ड के बृजेश भयानी ने लिखा है कि चीनी मीलों का गन्ना किसानों पर बक़ाया अपने सर्वाधिक स्तर पर पहुंच गया है। इतना कभी नहीं था। चीनी मीलों को 95.76 अरब रुपये चुकाने हैं। 2012 में 78 अरब तक पहुंच गया था। उत्तर प्रदेश के किसानों का चीनी मीलों पर सबसे अधिक 39.4 अरब रुपये बाकी हैं। जबकि यूपी चुनाव में सबसे बड़ा वादा यही था कि गन्ना किसानों का भुगतान समय से किया जा जाएगा।

यह आंकड़ा इस्मा का है जो चीनी मीलों की प्रतिनिधि संस्था है। इस्मा का कहना है कि चीनी आयात पर सौ फीसदी का प्रतिबंध हो। पाकिस्तान का चीनी भारत से भी सस्ता है। पता नहीं किसानों को पैसा जा रहा है या नहीं। किसानों की क्या हालत है।
उत्तर प्रदेश के दुग्ध उत्पादक किसान लगातार बता रहे थे कि दूध के दाम गिर गए हैं। उनकी लागत नहीं निकल पा रही है। मैं समझ नहीं पाया और न ही टीवी चैनल के पास इतने संसाधन हैं कि हर स्टोरी दौड़ कर कर ली जाए। आज इंडियन एक्सप्रेस में गोपाल कटेशिया और हरीश दामोदरण की रिपोर्ट पढ़कर समझ रहा हूं। दूध किसानों का सहारा रहा है। दूध बेचकर वे अपने घाटे की भरपाई कर लेते हैं लेकिन दूध के दामों में भारी गिरावट है। मार्केट क्रैश हो गया है। राजकोट डेयरी यूनियन ने पिछले दो महीने के भीतर प्रति किलोग्राम फैट का दाम 647 रुपये से घटाकर 560 रुपये कर दिया है। यानी प्रति लीटर दूध का दाम 39.98 रुपये से घटकर 34.61 प्रति लीटर पर आ गया है।

हमारे किसानों को कोई बताता ही नहीं कि दूध के बाज़ार में ग्लोबल क्रैश आ गया है। राजकोट डेयरी यूनियन का कहना है कि हम 761 गांवों से सुबह शाम दूध लेते हैं। अब हमें हर हफ्ते एक सुबह दूध नहीं लेंगे। उनके यूनयिन ने 47 कोपरेटिव सोसायटी से दूध लेना बंद कर दिया है जो 45,000 लीटर प्रति दिन दूध का उत्पादन कर रही थीं।

देश में एक किसान चैनल भी है। महा घटिया। आप कभी देखिएगा। दिन भर सरकार का विज्ञापन चलता रहता है। वहां जाकर चेक कीजिए कि क्या गन्ना भुगतान की समस्या और दुग्ध उत्पादन में ग्लोबल क्रैश की ख़बरें हैं? मिले तो मुझे भी बताइयेगा।
प्रधानमंत्री ने हाल के इंटरव्यू में रोज़गार को लेकर अपना आंकड़ा नहीं बताया। कम से कम विभागों के हिसाब से बताया जा सकता था ताकि लोग ख़ुद भी चेक करें। उन्होंने आई आई एम बंगलौर के अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि हर महीने छह सात लाख नौकरियां पैदा हो रही हैं। वित्त मंत्रालय की एक रिपोर्ट है कि सिर्फ केंद्र सरकार की नौकरियों में 4 लाख से अधिक पद ख़ाली हैं। प्रधानमंत्री कम से कम उसी पर बोल देते कि जल्दी भरेंगे। अब मेरे अभियान के बाद भरना पड़ गया तो क्या मज़ा। भरना तो पड़ेगा ही।

आप महेश व्यास के बारे में जान गए होंगे। महेश व्यास की संस्था CENTRE FOR MONITORING INDIAN ECONOMY PVT LTD बांबे स्टाक एक्सचेंज के साथ मिलकर सर्वे करती है। आप इसकी साइट पर जाकर रोज़गार संबंधित सर्वे के बारे में जान सकते हैं ।
महेश ने बिजनेस स्टैंडर्ड के अपने कॉलम में आई आई एम बंगलौर के घोष एंड घोष के सर्वे का मज़ाक उड़ाया है। उनका कहना है कि EPFO, ESIC NPS का डेटा तो पब्लिक होता नहीं, लगता है कि इन प्रोफेसरों को ख़ास तौर से उपलब्ध कराया गया है! इस एक लाइन में आप खेल समझ सकते हैं।

महेश व्यास का कहना है और जिससे किसी को एतराज़ भी नहीं होना चाहिए। वो कुलमिलाकर यही कह रहे हैं कि सरकार को ही अपना डेटा पब्लिक कर देना चाहिए। यह काम बहुत जल्दी में किया जा सकता है। कम से कम पता तो चले कि सरकारी नौकरियां कितनी हैं। फिर किसी और के अध्ययन के सहारे नौकरियों पर ख़ुश होने की ज़रूरत नहीं रहेगी। अपना आंकड़ा रहेगा।
उनकी बात में दम है कि आई आई एम बंगलौर के घोष द्वय की रिपोर्ट में कई तरह के झोल हैं। फिर भी उन्होंने एक तरह का अनुमान लगाया है। मैंने भी नेशनल सैंपल सर्वे के आधार पर एक तरह का अनुमान लगाया है। इससे अच्छा है कि सरकार बता दे कि कम से कम उसके यहां कितना रोज़गार पैदा हुआ?

जैसे महेश व्यास ने 2 जनवरी के कॉलम में लिखा था कि देश भर में सरकारी नौकरियों में 2 करोड़ 30 लाख लोग काम कर रहे होंगे लेकिन डॉ पुलक घोष और सौम्यकांति घोष बता रहे हैं कि 1 करोड़ 70 लाख ही लोग काम कर रहे हैं। अब यहीं पर साठ लाख का अंतर आ गया। क्या बेहतर नहीं होता कि सरकार विभाग दर विभाग नौकरियों के आंकड़े प्रकाशित कर दे। घोष युग्म के आंकड़ों से तो सरकारी नौकरियां घटी हैं!

महेश व्यास का कहना है कि घोष के अध्ययन से यह नहीं पता चलता कि पांच लाख रोज़गार था जो बढ़कर 11 लाख हुआ यानी बेस लाइन नहीं है जिससे पता चले कि पहले कितना था, फिर कितना हुआ। BSE-CMIE के अध्ययन के अनुसार 2017 में कुल रोज़गार 40 करोड़ था। अब अगर इसमे सत्तर लाख जोड़ देंगे तो इसका मतलब यह हुआ कि रोज़गार में वृद्धि 1.7 प्रतिशत की हुई। यह बहुत तो नहीं है। आगे आप उनका लेख बिजनेस स्टैंडर्ड में पढ़कर खुद भी समझ सकते हैं।

उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का दिल्ली के अख़बारों में विज्ञापन छपा है। इस विज्ञापन में उन्हें भारत का आदर्श मुख्यमंत्री बताया गया है। यह विज्ञापन भारतीय छात्र संसद की तरफ से छपा है। कोई कंपनी है क्या ये, कहां से पैसा आता है इनके पास।
मगर ख़ुशी की बात है कि भारत में 1 प्रतिशत लोग और अमीर हुए हैं। पहले उनके पास 58 फीसदी संपत्ति थी अब देश की 73 प्रतिशत संपत्ति हो गई है यानी एक प्रतिशत अमीर और भी अमीर हो गए हैं। टीवी पर कौन सबसे अमीर का शो देखिए। कितने ग़रीब हो गए, यह तो देखने को मिलेगा नहीं।

दूसरी तरफ 67 करोड़ ग़रीब और ग़रीब हुए हैं। इतनी बड़ी आबादी की संपत्ति में सिर्फ 1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। Oxfam की इस रिपोर्ट को आप अख़बारों में खोजिए। मैंने तीन अखबार खोजे, काफी बड़े वाले। दो में तो ख़बर भी नहीं थी, और एक में भीतर के आखिरी पन्नों में कहीं किनारे दबी मिली थी।

आंकड़ों की दुनिया भ्रमित भी करती है, कमाल भी करती है। डावोस में एक Inclusive Development Index जारी हुआ है। उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले 79 देशों की सूची बनी है। इसमें भारत का स्थान 62 वां हैं। 2 स्थान नीचे आ गया है। पहले 60 वें स्थान पर था। चीन 26 वें नंबर पर है और पाकिस्तान भारत से 15 पायदान ऊपर चला गया है। 47 वें नंबर पर है। नार्वे और लिथुआनिया टॉप पर हैं। इन सब मुल्कों की चर्चा आप भारत के मीडिया में सुनते भी नहीं होंगे।

79 देशों में भारत का स्थान 62 वां हैं। भारत का मीडिया बता रहा है कि डावोस में भारत की धूम है। पाकिस्तान 52 से बढ़कर 47 पर चला गया और हम 60 से गिर कर 62 पर आ गए। जागो भारत जागो। अख़बार पढ़ने से अख़बार पढ़ना नहीं आ जाता है। दिमाग़ लगाना पड़ता है।