क्या डायरेक्शन 120 121 समाप्त नहीं हो गया है ?

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि लोकसभा में विपक्ष का नेता क्यों नहीं है। इस एक सवाल से स्पीकर के फैसले की फिर से सार्वजनिक समीक्षा होने लगी है। अदालत में तो नहीं हो सकती मगर अब इस मसले पर स्पीकर सुमित्रा महाजन ने सार्वजनिक बयान देकर खुद ही समीक्षा का मौका दे दिया है। स्पीकर जब फैसला लेती हैं तो उनके सामने कई परंपराएं होती हैं जो बनती चली आ रही होती हैं। इंदौर में स्पीकर ने जिन बातों को अपना आधार बताया है उन बातों को नेता विपक्ष का विरोध करने वाले कई लेखक अखबारों में करते रहे हैं। पहले देखते हैं कि स्पीकर क्या कहती हैं।

“पहले तो में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर में कुछ नहीं कहुंगी, दूसरी बात है कि  विपक्ष के नेता नही होने का निर्णय जो दिया है वह नियमानुसार दिया है।  यह नियम डायरेक्ट टू स्पीकर है।  यह मावलनकर जी के समय से बने हुए नियम है इसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं हुआ है कम से कम इस नियम में तो कभी नहीं हुआ परिवर्तन। उस नियम में यह साफ कहा गया है कि जिस भी किसी पार्टी को रिकगनेशन देना है किसी विपक्ष पार्टी के नाते,उस समय यह सेलेरी यह नहीं थी मगर विपक्ष को रिकगनिशन देना है तो जो नॉम्स रखे है वह वन टेंथ होना जरुरी है। उनकी स्ट्रेंथ लोकसभा सदस्यो की वन टेंथ होना जरुरी है। फिर एक और बात कही है कि अगर काउंट करके भी बनाते है तो उनका चुनावी एजेंडा  भी एक ही होना चाहिए लोकसभा के बाहर और अंदर भी , अलायंस के हर पार्टी  के नेताओ ने हमें पत्र दिये थे कि एनसीपी ने भी दिया कि हमारी पार्टी का नेता यह रहेगा। इसका मतलब है कि उन्होने अलग अलग पार्टी बताई थी । उनका एजेंडा भी अलग था,एलायंस था पर एडेंडा अलग अलग था सिटो का एडजेस्टमेंट था, और इसलिए नियम के नाते विपक्ष की एक पार्टी करके नहीं दे सकती थी क्योकि सभी ने अपनी अपनी पार्टी  के नेता के लिए दिया था, उनके एक पार्टी के  नाते 44 ही सासंद है तो वन टेंथ तो नहीं है । परंपरा अनुसार भी यह रहा कि रुल में परिवर्तन नहीं है और रुल के अनुसार ही देना पडेगा । दुसरी बात यह है कि आप देखे की 1977 का हवाला दिया है जिसमें विपक्ष के नेता के अलाउंसेस सेलेरी के लिए था  उसमें भी लारजेंस्ट पार्टी को लेकर दिया लेकिन उसमें कहा कि लारजेंस्ट एंड  रिकगनाईज्ड  यानि की जिसको विपक्ष को रिकगनाईज्ड किया हो , कांग्रेस ने भी 1980 में विपक्ष का नेता नहीं माना था और उन्होने भी 121 स्पीकर डायरेक्ट का हवाला दिया था 1980 में और 84 में भी विपक्ष का नेता भी नहीं रहा था, 1969 में बनी तो कांग्रेस का भी एक धडा टुटा था।”

यानी स्पीकर भी डायरेक्शन 120 और 121 को प्रमुख कारण बता रही हैं। इसके तहत सदन के भीतर किसी पार्टी को मान्यता देने के लिए तीन आधार दिये गए हैं। पार्टी की अपनी विचारधारा हो, जनमत को भांपने का सदन के भीतर और बाहर सिस्टम हो और कोरम यानी कुल सदस्य संख्या का दसवां हिस्सा हो उसी को विपक्षी दल की मान्यता मिलनी चाहिए। मैंने पहले भी इस विषय पर इसी साइट पर एक लेख लिखा है। आप उसे भी पढ़ सकते हैं। मैं बस स्पीकर के डायरेक्शन 120 और 121 के बारे में एक जानकारी सामने रखना चाहता हूं। जब आप सांसद बनते हैं तो सदन की तरफ से आपको एक किताब दी जाती है। यह किताब भारत की संसदीय व्यवस्था के बारे में अथारिटी मानी जाती है तभी सदन की तरफ से दी जाती होगी। कहते हैं दुनिया भर में इसकी मान्यता है। यह किताब कहती है कि डायरेक्शन 120 121 समाप्त हो चुका है। स्पीकर कहती हैं कि नहीं समाप्त हुआ है। लेकिन एक किताब में साफ साफ लिखा गया है कि यह प्रावधान अब अस्तित्व में नहीं है।

इस किताब का नाम है प्रैक्टिस एंड प्रोसिज़र ऑफ पार्लियामेंट। इसे लिखा है एमएन कौल और एसएल शकधर ने। कोई छब्बीस सौ रुपये की पड़ गई। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में उपलब्ध है। इसके छठे संस्करण के चैप्टर चौदह के पेज 385 से 387 पढ़ना चाहिए। क्यों पढ़ना चाहिए क्योंकि स्पीकर के फैसले के पहले बीजेपी का दावा था कि स्पीकर के पास डायरेक्शन 120 और 121 के तहत किसी दल को मान्यता देने का जो निर्देश हैं, उसके मुताबिक सदन में किसी दल को मान्यता तभी मिलेगी जब उसके पास कोरम के बराबर संख्या हो।

लेकिन इस किताब का दावा है कि 1985 में दल बदल कानून के आने के बाद यानी 10वीं अनुसूचि के बाद स्पीकर का यह निर्देश अस्तित्व में नहीं रहता है। क्योंकि किसी संसदीय दल को मान्यता देने के स्पीकर के निर्देशों का जो प्रावधान है उसकी व्याख्या अब अलग नज़र से करने की ज़रूरत है। जब से दसवीं अनुसूचि अस्तित्व में आई है स्पीकर के इन निर्देशों का इस्तमाल सीमित हो जाता है। जैसे किस दल या समूह से स्पीकर चुनना है। विभिन्न संसदीय समितियों में किन किन को रखना है। सदन में बैठने की जगह क्या हो या संसदीय सामग्रियों की आपूर्ति कैसे की जाए। क्योंकि दसवीं लोकसभा में जब जनता दल का विभाजन हुआ तब इसकी व्याख्या यह निकल कर आई कि राजनीतिक दल को मान्यता देने का अधिकार क्षेत्र अब चुनाव आयोग के पास है।

फिर पेज 386 पर आगे लिखते हैं कि ग्यारहवीं लोकसभा के बाद से सदन में विधायी दलों को उनकी संख्या के आधार पर कुछ सुविधाएं मिलती रहीं लेकिन स्पीकर द्वारा निर्देश 120 और 121 के आधार पर मान्यता देने का प्रचलन समाप्त हो जाता है। मैंने शुक्रवार के प्राइम टाइम में इसका अंग्रेजी अंश भी पढ़ा था ताकि अनुवाद में किसी चूक की स्थिति में अंग्रेज़ी से भी स्थिति साफ हो जाए। मुझ बस हैरानी होती है कि सुभाष कश्यप ने स्पीकर के इस निर्देश को लेकर नेता विपक्ष के संदर्भ में कई लेख लिखे हैं। मुझे तो किसी लेख में कौल और शकधर की इस व्याख्या का ज़िक्र नहीं मिला, अगर आपको दिखा हो तो ज़रूर बताइयेगा।

संसद द्वारा दी गई किताब के अनुसार डायरेक्शन 120 और 121 समाप्त हो गया है। 1985 से समाप्त हो गया है। स्पीकर ने अपने इस संक्षिप्त बयान में 1985 से पहले के उदाहरण दिये हैं। ध्यान रखियेगा कि प्रेस कांफ्रेंस के बयान को आप संपूर्ण नहीं मान सकते हैं। फिर भी इसे एक नज़ीर के तौर पर आज़माया जा सकता है। कौल और शकधर की किताब कहती है कि राजनीतिक दल को सदन के भीतर मान्यता देने का चलन तो तभी समाप्त हो गया जब यह काम चुनाव आयोग करने लगा। दूसरे उदाहरण जो दे रही हैं वो नेता विपक्ष से संबंधित नहीं लगता है। अलग अलग दलों को स्पीकर को यह सूचना देनी होती हैं कि उनकी तरफ से सदन में नेता कौन होगा और चीफ व्हीप होगा। इसके लिए भी 1998 का एक कानून है। इस कानून में नेता विपक्ष शब्द का ज़िक्र तक नहीं है।  यह कानून सिर्फ किसी दल के चीफ व्हीप और नेता तक सीमित है।  नेता विपक्ष का 77 के कानून में ज़िक्र है। कौन नेता विपक्ष बनेगा इसे लेकर नहीं बल्कि नेता विपक्ष की तनख्वाह और सुविधायें क्या होंगी। इस एक्ट में नेता विपक्ष परिभाषित नहीं हैं। सिर्फ डायरेक्शन 120 और 121 में है। कानून और परंपराएं स्पष्ट नहीं हैं। सिर्फ इसके कि कांग्रेस ने कई बार नेता विपक्ष नहीं बनने दिया और न बनने देने की दलील मावलंकर के कायम निर्देशों के आधार पर दी है।

पर बात यह है कि क्या वो निर्देश अस्तित्व में है। एक मत कहता है कि है और दूसरा मत कहता है कि नहीं है। स्पीकर महाजन का तर्क कि सभी दलों के नेताओं ने अपने अपने नेता के नाम भेजे। अब यह साफ नहीं कि क्या नेता विपक्ष के पद पर दावेदारी के लिए नाम भेजे या 1998 के कानून के तहत स्पीकर को बताने के लिए कि उनकी तरफ से नेता कौन होगा और चीफ व्हीप कौन होगा। ध्यान रखिये कि सदन में किसी भी दल के नेता के रूप में मान्यता प्राप्त करना और नेता विपक्ष के रूप में मान्यता प्राप्त करना दोनों अलग बात है।  साठ के दशक में कुछ सांसदों ने मिलकर एक समूह बनाया था। नेता विपक्ष की मान्यता नहीं मिली थी मगर उन्हें बोलने का समय और कमेटियों में स्थान ज़रूर मिला। एक तरह से विपक्ष का मोर्चा पहले भी बन चुका है। पहले के वक्त में नेता विपक्ष को लेकर इतनी दिलचस्पी रही है या नहीं उस वक्त के लोग बतायेंगे लेकिन इसी आधार पर इस बहस को बेमानी नहीं करार दिया जा सकता है। पहले दिलचस्पी नहीं थी मगर अब है तो है।