डेरा, दलित और संकल्प आनंद के पिता के गीत

राजनीति में जीत से बड़ी कोई दलील नहीं होती। सारी व्याख्याएं इसी दलील के संदर्भ में की जाती हैं। हमेशा से ऐसा रहा है। अचानक सारा इतिहास बदलने लगता है, सारी व्याख्याएं नई होने लगती हैं और नए नए प्रतीक उतार लाए जाते हैं। नए न भी हों तो पुराने को निकालकर नया बना दिया जाता है। इसमें बुराई क्या है। सत्ता प्राप्ति का मान्य मार्ग तो यही है। कम से कम लोगों ने यही तो देखा है। मतदान करना लोकतंत्र का चरम है और वोटर उसके बाद चर्म रोग। वो फिर अखबारों के पन्नों पर रोज़ बनते एक नए इतिहास और अवतरित होते युग को हतप्रभ होकर देखता रह जाता है। बशर्ते उसके दायरे में कोई अख़बार, टीवी या रेडियो आता होगा। इस दायरे से बाहर रहने वाले लाखों लोग किस सूचनाविहीन शून्य में यात्राएं करते हैं इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। वो शायद ख़रीद बिक्री के क्रम में मूल्यों में होती गिरावट या बढ़ोत्तरी के आधार पर नायक को महानायक मानते होंगे। अख़बारों के कालम पढ़िये। या तो आशंकाएं हैं या फिर महिमामंडन। संतुलन या सवाल नहीं हैं। घोषणाओं का ऐसा उद्घोष कभी नहीं देखा गया। घोषणाओं के प्रति ऐसा एकतरफा विश्वास कभी देखा गया होगा मगर बहुत दिनों बाद देखा जा रहा है। सब कुछ अच्छा है। स्वागत योग्य है।

इन सब माहौल के बीच आप शुक्रवार के इकोनोमिक टाइम्स में यह ख़बर पढ़ते हैं कि कि बीजेपी ने अपने चवालीस उम्मीदवारों को डेरा सच्चा सौदा के संत राम रहीम के सामने परेड कराया। बाबा ने सबको आशीर्वाद दिया। इससे पहले यह खबर तो आई ही थी कि कैप्टन अभिमन्यु और अमित शाह ने डेरा सच्चा सौदा के संत से मुलाकात की है। अखबार लिखता है कि डेरा के हरियाणा में साठ लाख और महाराष्ट्र में पचीस लाख अनुयायी हैं। कांग्रेस पार्टी ने भी कोई सवाल नहीं किया। कैसे करती। खुद कांग्रेस के नेता डेराओं के चक्कर लगाते रहते हैं। आप गूगल करेंगे तो कैप्टन अमरींदर सिंह के पत्नी परनीत कौर से लेकर अनेक नेताओं के नाम मिलेंगे डेराओं के चक्कर लगाते हुए। किसी बाबा के सामने विधायकों का परेड कराया जाना कभी सुना नहीं गया। वैसे एक के शरण में जाने और चवालीस उम्मीदवारों के परेड कराने में कोई फर्क नहीं है। तब यह जनता जनार्दन की जीत है या किसी बाबा की । सब आशीर्वाद ही है या बदले में कुछ लेन देन भी हुआ है। जो पहले से चलता आया है। अब भी जारी है। अदालत में चल रहे मामलों के बदले यह समर्थन हासिल किया गया या आशीर्वाद स्वरूप। ये सब बातें जीत की आंधी में हवा हो जायेंगी। सब कुछ अमर चित्र कथा की तरह गुज़र रहा है। देव पुरुषों की दैवीय कृपा पर हिन्दुस्तान का मुस्तकबिल लिखा जा रहा है।

राजनीति में सबकुछ सामान्य रूप से स्वीकार कर लिया जा रहा है। इसने किया तो हम भी कर सकते हैं। होता रहा है। कुछ भी तो नहीं बदल रहा। फिर दरगाहों और मज़ारों का चक्कर लगाने वाले तुष्टीकरण कैसे कर रहे थे। डेराओं का चक्कर लगाना तुष्टीकरण नहीं हैं। संतों, सन्यासियों, मठों और योग संस्थाओं के प्रमुखों को एक पार्टी के समर्थन में चुनाव प्रचार में उतरना यह सब सामान्य है। लेकिन यह तो कोई नया वक्त बताया जा रहा था कि नया युवा या मतदाता राजनीति में धर्म और जाति के इस्तमाल को गलत समझता है। नकाबिले बर्दाश्त की हद तक। वो युवा यह भी तो जानता ही होगा कि इन डेराओं और संतों का अपना जातिगत आधार भी है जो कब धर्म और कब राष्ट्र के भेष में काकटेल बनकर राष्ट्रीय हो जाता है पता नहीं चलता। युवा नहीं जानता होगा तो जानने का प्रयास तो किया ही होगा। क्या इस दौर में सिर्फ इफ्तार करना तुष्टीकरण है। नेपाल के मंदिर में जाना धर्म के प्रति गर्व भाव है तो धर्म के आधार पर सबके साथ समान व्यवहार कैसे हो रहा है।

अगर धर्म से कोई गुरेज़ न हो तो डेरा सच्चा सौदा के बारे में गूगल कर लीजिए। क्यों सीबीआई में मामला चल रहा है और क्यों ऐसे मामले अंजाम तक नहीं पहुंचते हैं। राजनीति को राष्ट्रनीति बताकर धर्म से तथाकथित रूप से दूरी बनाने का यह हथकंडा कुछ और नहीं बल्कि उसके इस्तमाल का एक और रूप है। एक मज़हब को हाशिये पर धकेल कर दूसरे मज़हब की सभी संस्थाओं का खुलेआम इस्तमाल धर्म के नाम पर बराबरी का नया पैमाना है। कोई डर के मारे सवाल भी नहीं उठा रहा है।  कांग्रेस हो या बीजेपी या कोई भी दल सभी इसका सहारा लेते रहे हैं और ले रहे हैं। तो बदला क्या।

शायद बिहार के रोहतास ज़िले के मोहनपुर गांव की घटना की रिपोर्टिंग पढ़ लीजिए। आप ज़रा भी संवेदनशील होंगे तो बस पढ़ते हुए कल्पना कीजिए आप खुद से डर जायेंगे। पंद्रह साल का एक लड़का साईं राम अपने मानसिक रूप से बीमार भाई के साथ खा रहा था। उसकी बकरी किसी राजपूत का खेत चर गई। रिपोर्ट के अनुसार किसी और की बकरी भी खेत चर गई। रिपोर्टर को पता करना चाहिए था कि बाकी जिनकी बकरियां राजपूत साहब का खेत चर रही थीं वो किस जाति वाले मालिक की थीं। संजय सिंह मुन्ना के घर आए और दरवाज़ा धमकाने लगे। मानसिक रोगी मुन्ना ने दरवाजा खोला तो पिटाई करने लगे। साईं राम ने अपने बड़े भाई की पिटाई का विरोध किया तो संजय सिंह ने उस पर मिटटी तेल डालकर जला डाला। यह घटना जल्दी ही नीतीश कुमार, जीतन राम मांझी और सुशील मोदी के पाले में फुटबाल बन जाएगी। राज्य की जिम्मेदारी तो बनती ही है लेकिन क्या इनमें से कोई भी उस राजपूत या सवर्ण मानसिकता के खिलाफ बोलेगा। नहीं बोलेगा। नीतीश बोलेंगे न जीतन राम मांझी न सुशील मोदी न प्रधानमंत्री।

मैं बस यह सोच कर हताश हूं कि बिहार में ऐसा क्या बदला कि दलितों के सत्तर घर होते हुए भी एक राजपूत आता है और एक बच्चे को जला देता है। आखिर इस राजपूत में इतना साहस कहां से आया। जाति से, ज़मीन से या उस कानून व्यवस्था से जो एक खास तरह के पारिवारिक, जातिगत और धार्मिक नेटवर्क से चलता है। क्या कोई इस जातिवाद के खिलाफ बोलेगा। बोलेगा जब वोट का टाइम आएगा। यह सब घटनाएं आंकड़ें बनकर करोड़ों रुपये के होर्डिंग पर चढ़ जाएंगी और राजनीतिक फैसले का कारण बनेंगी। बनती रहें । मगर हालात बदलते क्यों नहीं हैं। आप उस संजय सिंह की मनस्थिति की कल्पना कीजिए और उस साईं राम की जो भोजन के बीच में ही जलाकर मार दिया जाता है। आप इस जातिवादी मानसिकता के खिलाफ किसी नेता को बोलते सुनना तो बताना। सब बोलेंगे मगर किसी दल के खिलाफ किसी नेता के खिलाफ। नतीजा दोषी कोई हो जाए और असली दोषी बच जाएगा।

वैसे ही जैसे बंगलुरू से लेकर गुड़गांव तक में लोग उस अखंड भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के नागरिकों को पीट डालते हैं। उन्हें उनकी बनावट, पहनावे से नफरत है। हिंसा करने वालों के बीच नफरत की यह भावना किसने भरी है। युवा के पास टाइम नहीं है इस पर सोचने के लिए। सोचेगा तो उसे इस दल या उस दल की निष्ठा से निकलकर तकलीफदेह यात्रा से गुज़रना होगा। ज़ाहिर है कानून व्यवस्था का सवाल बनाकर सवाल जवाब का खेल खेल लो और स्थिति जहां है वहीं छोड़ दो। अगर ऐसा नहीं करेगा तो वो टीवी पर संकल्प आनंद के गीतकार बाप को बिलखते देखने की हिम्मत नही कर पायेगा। जब कोई एंकर आत्महत्या करने वाले प्रोफेसर संकल्प आनंद के रोते बाप की तस्वीरों के ऊपर उनके लिखे गानों की याद दिला रहा था, बता रहा था कि ये कौन है, किसका बेटा है मैं यही सोच रहा था कि हम कितना कुछ बर्दाश्त कर लेते हैं। बाप के मुंह से बेटे की मौत के ग़म में झाग निकल रहे हैं और एंकर बता रहा है कि रोने वाले ने लिखा है कि जो प्यार कर गए वो लोग और थे, तेरी दो टकिया की नौकरी पे मेरा लाखों का सावन जाए, राजकपूर से लेकर प्रेम रोग तक के गाने लिखे। किसे ने सोचा तक नहीं कि इसी सूचना को उस रोते बिलखते बाप की तस्वीर से निकलने के बाद भी दिया जा सकता था। मगर हम सब बर्दाश्त कर रहे हैं।  इतना कुछ कि इंडियन एक्सप्रेस में खबर छपती है कि महाराष्ट्र कांग्रेस एन सी पी सरकार के कैबिनेट के आधे मंत्रियों के स्कूल कालेज की दुकानें खुली हुईं हैं। स्वीकार न करते तो इसी एन सी पी के नेता प्रफुल्ल पटेल की ट्वीट खबर न बनती कि सरकार बनाने में हमारी भी भूमिका होगी या हो सकती है। इसलिए सवाल सिर्फ विरोधी से करने का चलन ही ठीक है। खुद से सवाल करेंगे  तो सौ मौतें मरेंगे। ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी है कि हम खुद से नहीं दूसरे से सवाल करें। उसे दोषी बनाकर बताकर समाज में हैसियत और चुनाव में सरकार बनायें।