चुनाव से पहले अपने आप से हारता बिहार

बिहार अपने आप से हारता जा रहा है। चुनाव में दो में से कोई एक गठबंधन तो जीत जाएगा लेकिन इस चुनाव में बिहार की हार तय होने जा रही है। इतना उद्देश्यहीन और हल्का चुनाव कभी नहीं देखा। हर तरफ़ अनैतिक गठबंधन हैं। अवाम पर भी इन सब बातों का कोई असर नहीं होने वाला क्योंकि जाति के हिसाब से दलीलें फिक्स हो चुकी हैं। बाकी काम जातियों में सेंध लगाकर पूरा किया जा रहा है ताकि उनकी निष्ठा में दरार आ जाए। वो दरार अब दलीलों से नहीं आने वाली है, दंगों से आ सकती है। इसलिए सांप्रदायिक झगड़े हो रहे हैं और कराये भी जा रहे हैं ताकि इलाके में घटना को लेकर बहस हो और बहस करते करते लोग हिन्दू मुसलमान में बदलने लगें।

इंडियन एक्सप्रेस के अप्पू इस्थोस सुरेश की तीन खंडों में तैयार की गई रिपोर्ट को पढ़ियेगा। दूसरों को भी पढ़ाइयेगा। पहले यह जानने के लिए पढ़ियेगा कि नेताओं को व्यक्तिगत रूप से जानना, उनका इंटरव्यू करना या किसी राज्य में पैदा होने से लेकर बीस साल तक पत्रकारिता करना काफी नहीं होता है। अप्पू की रिपोर्ट बिहार में फूफा बनकर घूम रहे पत्रकारों के लिए भी एक गाइड का काम कर सकती है। हम जैसों कमराबंद एंकरों के लिए तो है ही। दूसरा यह जानने के लिए पढ़ियेगा कि अख़बार के विकल्प में टीवी और सोशल मीडिया तो आ गया मगर पत्रकारिता का विकल्प इन माध्यमों में तैयार नहीं हो सका। तीसरा इसलिए भी पढ़ियेगा कि हम वाकई इतने क्रूर और असहनशील हो चुके हैं कि मामूली घटनाओं को भी हिन्दू मुस्लिम दंगों में बदल सकते हैं। चौथा इसलिए पढ़ियेगा ताकि पता चले कि कैसे हमारे राजनीतिक दल मौका देखकर सांप्रदायिक सवालों पर चुप रहते हैं या बोलते हैं।

क्या यह किसी आम भारतीय या बिहारी के लिए सामान्य बात है कि जून 2013 से जून 2015 के बीच बिहार में सांप्रदायिक टकरावों की संख्या तीन गुना बढ़ गई है। क्यों किसी को इन घटनाओं में समाज को तोड़ने की प्रवृत्ति नहीं दिख रही है। टूटे हुए समाज को लेकर सरकार बना भी लेंगे तो क्या कर लेंगे। उसी अविश्वास से लड़ते रह जायेंगे और दूसरा चुनाव आ जाएगा। किसी दल की हार जीत की कीमत पर क्या आम बिहारी अपने पड़ोस में आग लगाने के लिए तैयार हो गया है। सवाल यह नहीं है कि इसके पीछे कौन है। आदमी और दल छोड़ दें तो यह तो सबको दिख रहा है कि एक सोच है। वो सोच कोई संस्था लेकर भी आ सकती है और वो सोच लोगों में भी पहले से हो सकती है। आप इंडियन एक्सप्रेस को पढ़ते वक्त ज़रा सा भी विवेक का इस्तेमाल करेंगे तो टकरावों के कारणों को पढ़ते हुए शर्म से डूब जायेंगे।

क्या कोई गांव-देहात में इसके ख़िलाफ़ बोलने वाला नहीं है। राजनीति तो नहीं बोल सकती है। आखिर वहां की सरकार को तो पता ही होगा। उसके पास तो ये सब रिकार्ड होंगे। सरकार ने क्यों नहीं समाज को सतर्क किया। क्या इस डर से कि बोलने से लगेगा कि मुसलमानों का पक्ष लिया जा रहा है और ध्रुवीकरण होगा। शामिल तो दोनों ही हैं। दोनों के ख़िलाफ़ क्यों नहीं बोला जा सकता है। आम हिन्दू भी तो सांप्रदायिकता का विरोध करता है। उसमें इन नेताओं का भरोसा क्यों नहीं है। दरअसल ये नेता मेहनत नहीं करना चाहते जितनी सांप्रदायिक शक्तियां कर रही हैं। ये किसी घटना पर बोलकर चुप हो जाते हैं या बोलते ही नहीं हैं। अगर सदभावना में यकीन है तो गांव-गांव धर्मनिरपक्षेता को लेकर यात्रा नहीं करते। लोगों से बात क्यों नहीं करते। जबकि सांप्रदायिक सोच का विस्तार सक्रिय ढंग से किया जा रहा है। लेकिन समाज क्यों हार रहा है। क्या वो इन दंगों या टकरावों के बग़ैर वोट देने का फैसला नहीं कर सकता है।

सासाराम में पतंग लाने कुछ बच्चे दीवार कूद कर क्रबिस्तान में आ गए। कब्रिस्तान वाले ने डांटा या मारा जिसके नतीजे में भीड़ आ गई और गुस्से में सोनकर साहब ने गोली दाग दी। एक आदमी मर गया और 17 घायल हो गये। आज वे जेल में हैं। उनके भाई और क्रबिस्तान के नौशाद दोनों को अफ़सोस हो रहा है। अक्तूबर 2014 को दरभंगा में एक साइकिल सवार किसी से टकरा गया। साइकिल सवाल मुस्लिम था इसलिए गांव के लोग आपस में भिड़ गए। क्या हम इतने मूर्ख हो गए हैं। मोतिहारी के ढाका में बिजली के बल्ब तोड़ दिये जाने को लेकर दोनों संप्रदाय एक दूसरे पर शक कर बैठे और भिड़ गए। रोहतास में एक हॉकर कमरूद्दीन और दुकानदार सुदर्शन साह के बीच कहासुनी हो गई। सांप्रदायिक झगड़े में मामला बदल गया। जमुई में एक मोटरसाइकिल दुर्घटना सांप्रदायिक झगड़े में बदल गई। क्या ये सब किसी को नहीं दिख रहा है। क्या ये सब इतनी बड़ी घटनाएं हैं जिसे लेकर मरने मारने पर लोग उतारू हो जा रहे हैं।

बच्चों के बीच का झगड़ा और खेल-खेल में होने वाली कहासुनी भी हिन्दू मुस्लिम विवाद में बदल रही है। हरियाणा भर में नीलगाय से किसान परेशान है। वहां तो ज़्यादातर किसान हिन्दू ही हैं। लेकिन बिहार में इस अफवाह़ पर तनाव हो गया कि किसी मुस्लिम ने नीलगाय का शिकार किया है। तो थाने भेज देते न। भीड़ बनकर दोनों समुदाय के लोग क्यों जा रहे हैं हिसाब करने। नवादा में ऑटो के किराये को लेकर बहस हुई और मामला हिन्दू मुस्लिम में बदल गया। इंडियन एक्सप्रेस ने थानों में कराई गई प्रविष्ठियों से जो कारण उठायें हैं वो वाकई शर्मसार करने वाले हैं।

हो सकता है कि किसी संगठन का हाथ हो लेकिन इन घटनाओं को देखते हुए पहली नज़र में यही लगता है कि लोग अपने आप भीड़ में बदल रहे हैं। हिन्दू भी और मुस्लिम भी। लगता है संगठन से ज़्यादा उसकी सोच काम कर रही है। इससे संगठनों का काम और आसान हो रहा है। संगठन का काम है सोच का विस्तार करना और ऐसी घटना के समय अफवाह का प्रसार। बाकी लोग ट्यूशन से लौटते बच्चों के झगड़ों या बकरी बांधने को लेकर होने वाली कहासुनी को हिन्दू मुसलमान विवाद में बदलने के लिए सक्षम हो गए हैं। एक्सप्रेस की रिपोर्ट में एक और पैटर्न दिखा। एक तरफ मुस्लिम ग़रीब और दलित जातियां हैं। दूसरी तरफ़ हिन्दू ग़रीब और कमज़ोर पिछड़ी जातियां हैं। इनके झगड़े का लाभ किसे मिल रहा है आप हिसाब लगा सकते हैं। ऊंची जाति के लोग ऐसे दंगों के कानूनी पचड़ों को समझ गए हैं। इसलिए अब वे सामने नहीं हैं। हिन्दू मुसलमान के ग़रीब पिछड़े और दलित को आपस में भिड़ाया जा रहा है।

मुझे पता है बिहारी समाज पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। सब इस घटना के खिलाफ बोलने की जगह अपनी अपनी दलीय निष्ठाएं बचाने लगेंगे। राजनेताओं में साहस नहीं रह गया है। इनके अनैतिक गठबंधनों ने धर्मनिरपेक्षता को ही दाग़दार कर दिया है। जिसका लाभ उठाकर सांप्रदायिक शक्तियां खुद को नैतिक घोषित कर रही हैं। कोई हिंसा और अविश्वास की राजनीति का समर्थन कैसे कर सकता है। आम लोग इसके ख़िलाफ़ बोल सकते थे मगर सबकी अपनी अपनी जाति है। जाति के कारण उनका पार्टीकरण हो गया है। जाति की आड़ में सब अपने अपने दलों से चिपके हुए हैं।  बिहार हार गया है।