हैैप्पी न्यू ईयर- चोरों की राष्ट्रीयता और नायकवाद

फ़िल्म क्या सोच कर बनाई जाती है और हम देखते देखते उसमें क्या क्या देखने लगते हैं इन दोनों के बीच वो फिल्म अनगिनत यात्राएं तय कर लेती हैं। इस दौरान वो इतनी छवियां बना लेती हैं जिसमें आप कई तरह से पढ़ने लगते हैं। कोई इस फिल्म की समीक्षा करते हुए चार या ढाई स्टार देकर काम पूरा कर लेता है तो कोई इसका पाठ करते करते किताब के पन्ने की तरह पलटने लगता है। फिल्म में बहुत कुछ दिखता है। सुबह सुबह हैप्पी न्यू ईयर का पहला शो देखने चला गया। मेरी ग्यारह साल की बेटी बहुत चाव से देख रही थी और मैं बहुत बोर हो रहा था। जिन किस्सों को मैं खारिज कर रहा था उन्हीं किस्सों में वो डूबी हुई थी। दोनों में एक बात तो सामान्य है। शाहरुख़ ख़ान फिल्मी दुनिया का हमारा बादशाह है। हम शाहरूख़ ख़ान को पसंद करते हैं। न करते तो इस फिल्म को नहीं झेल पाते।

दरअसल यही आज के समय का दर्शक होना है। आपकी पसंद और ना पसंद पहले से तय है। उसका किसी फिल्म के बेहतर होने से कोई संबंध नहीं है। इस एक कारण से हैप्पी न्यू ईयर वाकई में साल 2014 की फिल्म है। फिल्म शुरूआत में ही उन तमाम कारणों पर पानी डाल देती है जिनके सहारे में हम किसी मसले की जटिलता को समझते हैं। यह फिल्म अमीर ग़रीब सच झूठ टाइप के तमाम खांचों को खारिज करते हुए एलान कर देती है कि दुनिया में दो ही टाइप के लोग होते हैं। एक विनर और दूसरा लूज़र यानी एक विजेता और दूसरा पराजित। फिल्म समाज का ऐसा ख़तरनाक और सीमित वर्गीकरण करती है जिससे शायद ही कोई सन्यासी सहमत हो या शायद ही कोई माता पिता। साल 2014 की राजनीति भी तो सबको दो खांचे में बांट देती है। एक विजेता की और दूसरा खांचा पराजित । इसके बीच की सारी बहसें,नैतिकताएं सब मिट्टी में मिला दी जाती हैं। क्या यह अनायास हुआ होगा कि फिल्म के एक सीन में नरेंद्र मोदी का पुतला या कहिये तो डमी टीवी में प्रवेश करता है और कहता है कि अच्छे दिन आने वाले हैं। मोदी भक्त जब इस फिल्म को समझेंगे तो पता नहीं उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी।

आप पाठकों और दर्शकों में कई रोज़ाना टेलिविजन पर तरह तरह के रियालिटी शो देखते हैं। डांस इंडिया डांस, कौन बनेगा करोड़पति, बिग बास, इंडिया का सिंगर। इन सब रियालिटी शो में ग़रीबी और संघर्ष की ऐसी दास्तां होती है कि उनके बयां करते वक्त घर में बैठा दर्शक भी रोता है और रियालिटी सेट पर बैठा दर्शक और जज भी। आंसुओं की धार बहती है और माहौल भावुक होते देख कैमरा भी चेहरे को और टाइट फ्रेम में ले आता है। अगर ये मसाला न हो तो विजेता की जीत बड़ी नहीं मानी जाएगी। ऐसा नहीं है कि इससे पहले भारतीय राजनीति में किसी ने अपनी ग़रीबी और संघर्ष को राजनीतिक पहचान का हिस्सा नहीं बनाया हो। ऐसा भी नहीं कि टीवी या हिन्दी सिनेमा में ये किस्सा पहले कभी नहीं आया लेकिन जब हैप्पी न्यू ईयर के तमाम पात्र एक रियालिटी सेट पर जमा होते हैं तो शाहरूख बना चार्ली सबकी स्टोरी तलाशता है। किसी की मां बीमार है तो किसी को स्कल खोल कर इज्जतदार ज़िंदगी जीने का सपना है तो किसी को अपने बाप का बदला लेना है। चार्ली की टीम ऐसे अनगिनत रियालिटी टीवी के पात्रों की टीम है जिनके दर्द भरी दास्तां के वक्त सब कुछ स्लो मोशन में चलने लगता है। हो सकता है फराह ख़ान ने आज की फिल्म बनाने  के लिहाज़ से मौज मस्ती में मोदी का वो दस सेकेंड का सीन डाल दिया हो लेकिन सिनेमा में सबकुछ यूं ही नहीं हो जाता।

इसीलिए जब चार्ली की टीम टीवी पर आती है और ऐसी कहानियां बयान करती है तो सबके हाथ में नोकिया का मोबाइल फोन उठ जाता है। सब चार्ली की टीम के लिए वोट करने लगते हैं। सब भूल जाते हैं कि ऐसा करते वक्त उन्होंने देखा ही नहीं कि किसी और भी टीम ने बेहतर प्रदर्शन किया है। हैप्पी न्यू ईयर की कहानी को हैकर, फेसबुक की दोस्ती और फर्ज़ी एस एम एस के ज़रिये प्रतियोगिता जीतने की छवियों के बिना नहीं समझ सकते हैं। हैकर ही तो है जो बहुत सारे लाइक्स जुटा लेता है, अनैतिक तरीके से चार्ली की टीम को दुबई में होने वाली प्रतियोगिता में जीतने लायक बना देता है। जनता का बड़ा हिस्सा ठगा सा रह जाता है। वो स्तब्ध है कि जिस टीम ने बेहतर प्रदर्शन किये वो हार गई। जिसे जीतना चाहिए था वो हार गई मगर जिसने सबसे खराब प्रदर्शन किये वो टीम तो जीत गई। कहानी के इस फ्रेम को समझना होगा। आज टीवी की पत्रकारिता, सीरीयल के किस्सों में प्रतिभा और असली कंटेंट यानी किस्से को ढूंढने वाले दर्शक कैसे दरकिनार कर दिये जाते हैं। कोई अदृश्य हैकर है जो सारे कंटेंट को एक सा नीरस बनाकर भी लोकप्रिय करा देता है। हैप्पी न्यू ईयर का मकसद तो यह नहीं है मगर मुझे इसकी कहानी में ये कहानी दिखने लगी। इसीलिए आज राजनीति में टीवी के ज़रिये लोकप्रियता गढ़ने के खेल को आप स्वाभाविक नहीं मान सकते।

चार्ली की टीम लोकप्रिय होने लगती है। फिल्म के एक सीन में किसी दफ्तर के कर्मचारी शाहरूख खान का मुखौटा लगाए हुए हैं। आज कल की लोकप्रियता का असर ही कुछ ऐसा है या फिर लोकप्रियता गढ़ी ही इस तरह से जाती है कि सब उसका मुखौटा पहन लें। इस फिल्म के शाट में बार बार अटलांटिस हाउसिंग सोसायटी का शाट आता है। हाउसिंग सोसायटी का गेट ही सेट बन गया है। जिसके बाहर हज़ारों की भीड़ है जो कृत्रिम रूप से नारे लगा रही है। ऐसी भीड़ अब आपको हर तरह की रैलियों में दिखने लगी है। ये वो भीड़ है जिसे कोई भी बना सकता है। चार्ली का बाप चोर है। इस इल्ज़ाम का बदला लेने के लिए वो कई लोगों को जुटाता है। हीरा चोरी करने की योजना बनाता है। इसके लिए टीवी के एक पोपुलर शो को हैक कर यानी फर्जी तरीके से दर्शकों का समर्थन प्राप्त करके दुबई पहुंच जाता है जहां हीरा रखा है। आज न कल भारतीय राजनीति का इतिहास लिखते समय रियालिटी टीवी का इतिहास भी लिखा जाएगा। बदला लेने के नाम पर चोरों की मंडली जमा होती है और टीवी के रियालिटी शो को अपना हथियार बनाती है। टीवी का सहारा लेकर चोरी के प्लान को राष्ट्रवाद का प्रतीक बना दिया जाता है और जनता समर्थन में आ जाती है। आपकी नैतिकता जो भी हो लेकिन आप जनमत का अनादर नहीं कर सकते। चार्ली की टीम जीतती है तो टीवी का एंकर कहता है ये क्या इंडिया। तुमने किसको चुना।

ठीक है कि चार्ली यानी शाहरूख खान के पिता के साथ जैकी श्राफ के किरदार ने धोखा किया है। लेकिन उससे बदला लेने का जो रास्ता चार्ली ने चुना वो भी तो गैरकानूनी है। चोरी का रास्ता है। डकैती का रास्ता है। इस फिल्म की शुरूआत होती है एक बाक्सिंग रिंग से। जिसमें पैसे लेकर शाहरूख ख़ान हार रहा है। मैंने इधर के चुनावों में ऐसे कई उम्मीदवारों को देखे हैं। जो पैसे लेकर चुनाव हारते हैं या लड़ते हैं ताकि इससे किसी की हार या जीत तय हो सके लेकिन जैसे ही वो हारने वाले से बाप के चोर होने की ललकार सुनता है चार्ली का ईमान उसे बागी बना देता है। चार्ली पल भर में उसे धाराशाही कर देता है जिससे उसे जीतना था। पूरी फिल्म समाज और राजनीति में नैतिकता को नकारते हुए आगे बढ़ती है। और एक ऐसे मोड़ पर पहुंचती है जहां अनैतिकता राष्ट्रवाद और धर्म में घुलने लगती है।

हीरा चोरी कर चार्ली की टीम भागने की योजना के मुताबिक एक नाव में जमा होती है। तभी टीम की नायिका को ख्याल आता है कि जिस डांस प्रतियोगिता में वो हिस्सा लेने आए थे वहां नहीं गए तो इंडिया की इज्ज़त उतर जाएगी। टीम के बाकी डाकुओं पर भी राष्ट्रवाद भारी पड़ जाता है। वो मंच पर लौटते हैं और यहां रौशनी के खिलाफ छाया बनकर शाहरूख का बोला संवाद अद्भुत है। शाहरूख ख़ान कहते हैं कि भारत में ठीक है कि दंगा है। अखबार स्कैम से भरे पड़े हैं लेकिन भारत हमारे लिए भारत है। बिल्कुल हु ब हू तो नहीं लिखा है मैंने लेकिन यह संवाद हमारी राजनीतिक वास्तविकता के बिल्कुल करीब है । भारत की समस्याएं तो अपनी जगह हैं ही लेकिन इन सबके समाधान करने के तरीकों से ऊपर है भारतीयता। इन डाकुओं के हाथ में तिरंगा आ जाता है और गाना बजता है राधे राधे बोलो जय कन्हैया लाल की। अचानक चार्ली की टीम की अनैतिकता पर नैतिकता का चादर चढ़ जाता है और जनता इन्हें भारत समझ कर इनके लिए हो हल्ला करने लगती है। दृश्य भावुक बन जाता है। देखने वालों के दिलों दिमाग में इंडिया जाग उठता है। दर्शक एक बार फिर इंडिया की खातिर नैतिकताओं को दरकिनार कर देता है। चार्ली जानता है। इस पब्लिक को अब सिर्फ हार और जीत से मतलब है। क्यों हार रहा है और क्यों जीत रहा है उससे मतलब नहीं।

बीसवीं सदी का कचरा है राष्ट्रवाद। कोई चाहे तो इस कचरे को उठाकर इसमें धर्म और देशभक्ति मिलाकर कुछ भी हासिल कर सकता है। यह वो प्लास्टिक है जो बेकार होकर भी मिट्टी में नहीं मिलता। ग्लोबल दौर में भी धीरे धीरे तमाम देश दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद के उभार के साथ अपनी अपनी सीमाओं की बात करने लगे हैं। राष्ट्रवाद की रीसाइकलिंग होने लगी है यानी बेकार पड़ी चीज़ का फिर से इस्तमाल होने लगा है। हैप्पी न्यू ईयर बहुत ही साधारण फिल्म है मगर इस फिल्म की कहानी अनायास हमारी आज की साधारण वास्तविकताओं के बेहद करीब आ जाती है। हैप्पी न्यू ईयर की कहानी बताती है कि डाकुओं का दल भी राष्ट्रवादी हो सकता है। फिल्मों की कहानियां कानून के स्पेस यानी बंदिशों से आज़ाद होती है इसके बावजूद वो कानून की बनाई नैतिकता से मुक्त नहीं हो सकतीं। चार्ली कितना भी कहता रहे कि दुनिया में दो ही लोग होते हैं। एक विजेता और दूसरा पराजित। इसके अलावा सारी दलीलें बेकार और समाप्त लेकिन कोई तो है जो इस खेल को समझ रहा होगा। दो तरह से समझेगा। या तो इस खेल को सीधा पलट देगा या फिर एक और रियालिटी सेट बनाएगा और तमाम अंतर्विरोधों और नैतिकता के मापदंडों को दरकिनार करते हुए दुबई से अपने हिस्से का हीरा ले आएगा। इस फिल्म में हीरा कुछ और नहीं बल्कि राजनीतिक सत्ता है जिसे आप टीवी के रियालिटी शो से हासिल कर सकते हैं। बस इस समीक्षा को पढ़कर फिल्म देखने की ग़लती मत कीजिएगा। वो फैसला आपके विवेक के आधार पर होना चाहिए।

(यह लेख गांव कनेक्शन अखबार और साइट पर प्रकाशित हो चुका है)