गेस्ट ब्लॉग : नील की खेती और चंपारण सत्याग्रह

यह पोस्ट क़स्बा के पाठक अतुल कुमार नें लिखा है।

चंपारण बिहार के उत्तर -पश्चिम में स्थित हैं। धान की भारी उपज होने के वजह से अंग्रेजी शासन के दौरान कई बार इसे चावल का कटोरा भी कहा जाता था। चंपारण के कई इलाकों में जल जमाव की समस्या रहती थी। नील की खेती के लिए इस प्रकार का खुश्क वातावरण वरदान था और इस वजह से यहाँ के किसानों से जबरदस्ती नील की खेती भी करवाई जाती थी।

चंपारण में नील की खेती के लिए दो अलग अलग व्यवस्थायें प्रचलित थीं। जेरैत और असामीदार। जेरैत डिपार्टमेंटल खेती होती थी, निजी देख-रेख में। असामीदार किसान किरायेदार की तरह होता था जहाँ उसे नील की खेती ही करनी होती थी। भू-भाग का एक चौथाई हिस्सा जेरैत के लिए आवंटित था तथा तीन चौथाई असामीदारी के लिए। इसी कारण इस व्ययवस्था को “तिनहथिया” भी कहते थे। असामीदार किसान जेरैत खेतों में मज़दूर का काम भी करते थे या यूं कहिए बेगारी करते थे।

उन्नीसवी सदी के उत्तरार्ध में ४७००० एकड़ से ज्यादा में नील की खेती होती थी। बेहतरीन जर्मन नील से प्रतिस्पर्धा के वजह से १९१४ तक नील-रोपण तकरीबन ८१०० एकड़ तक ही सीमित रह गयी थी। प्रथम विश्व युद्ध के वजह अंग्रेजी हुकूमत नें जर्मनी से नील का आयात बंद कर दिया था। इस वजह से नील की माँग फिर बढ़ने लगी और चम्पारण नील की खेती के लिहाज से फिर से प्रासांगिक होने लगा। सरकार और जमीनदारों ने नील उत्पाद क्षेत्रफल विस्तृत करना आरंभ कर दिया।

इसके अलावा शाषन व्यवस्था और ज़मींदारों ने एक “तीन कठिआ ” सिस्टम लगा रखा था जिसमें एक बीघे में तीन कट्ठे नील की खेती आरक्षित होते थे। एक चम्पारणी बीघा (जो तकरीबन 0.4 एकड़ के सामन होता है) के अंदर २० कट्ठे होते थे। फ़लस्वरुप इसका नाम “तीनकठिआ” पड़ा। १८६७ के पहले इन ज़मीनों पर पाँच कट्ठे आरक्षित होते थे नील खेती के लिए। फैक्ट्रियों में फसल देने के दौरान भी खेतिहरों पर अनेक तरह के कर लगते थे जिसमें बपाही-पुताही, मरवच, और सगौरा प्रमुख थे। इन सब करों के बावजूद फैक्ट्रियाँ फसलों का गलत मूल्यांकन करती थी और किसानों को फसल अदायगी कभी समय पर नहीं होता था। हालांकि अगर देखे तो फैक्ट्रियों से किसानों की अदायगी की स्तिथि में कोई विशेष बदलाव आज तक नहीं आया है।

इन परिस्तिथियों में भी नील कंपनियों के बही खाता को सुधारने के लिए अंग्रेजी हुकूमत नें नए करों को लगाने और पुराने करों को बढ़ाने की इज़ाज़त दे दी। उस वक़्त ये कम्पनियाँ किसानों से जबरन वसूली के लिए “खलीफ़ा” (आज भी चम्पारण के कुछ इलाकों मे पहलवान को खलीफ़ा ही बोलते है) रखा करती थीं। सन १९१४ के दौरान खलीफाओं के साथ साथ आकाल भी किसानो के दरवाजे पर दस्तक देने लगी थी।

१९१४ में पिपरा में नील की खेती करने वालों किसानों ने अनुबंधित मज़दूरों के साथ मिलकर इस नाइंसाफी का विरोध किया। यह अहिंसा पर आधारित एक असहयोग था। खलीफाओं के छिट पुट दमन पर भी उनका असहयोग हिंसा से दूर रहा। पेट की आग ने आनन-फानन में इस असहाय असहयोग आंदोलन को निबटा जरूर दिया पर किसानों-मज़दूरों को एक रास्ता दिख चुका था।

१९१६ में पुनः तुरकौलिया में एक अहिंसक असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ। यह आंदोलन एक बड़े पैमाने पर था और कुछ लंबा भी खिंचा। स्व-निर्वाह के कारण इसका टूटना भी लाजिमी था और वही हुआ। हाँ दोनों आंदोलन के दौरान किसानो मज़दूरों पर दमन होने के बावजूद हिंसा नहीं हुई । शायद इतिहास नें कभी इन करुणामय मगर अद्वितीय परस्थितियों को महातम के निगाह से नहीं देखा मगर यह एक बड़ी घटना थी जो महात्मा गाँधी के अहिंसा के विचारों से पंक्तिबद्ध थी और शायद इसी नें महात्मा गाँधी को चंपारण आने के लिए प्रेरित भी किया।

दिसंबर १९१६ में लखनऊ में आयोजित ३१ वें कांग्रेस अधिवेशन में राज कुमार शुक्ल कई कांग्रेसी नेताओं से मिले। उन्होंने सभी बड़े नेताओं को चम्पारण के नील किसानों-मज़दूरों की बदहाली और नील कंपनियों के दलाली के बारे में अवगत कराया ताकि यह मुद्दा कॉन्स्टीटूएंट असेंबली में उठे ।

उन्होंने गाँधीजी को भी इस मसले पर विस्तार से बताया। पूरी तन्मयता से सुनने के बाद भी महात्मा गाँधी ने विशेष रुचि नहीं दिखायी। बिहार में कांग्रेस की तुल्नात्मक पकड़ और फिर चंपारण जैसे पिछड़े इलाके में सविनय आंदोलन की पृष्ट्भूमि महात्मा के विशिष्ट मानसिक पटल पर शायद जगह नहीं बना पा रही थी। राज कुमार शुक्ल स्वयं एक जमींदार थे और उनके मुख से किसानों मज़दूरों की बदहाली का विवरण ने गाँधीजी को प्रभावित किया था। अंततः जब शुक्ल जी ने पिपरा और तुरकौलिया में किसानों-मज़दूरों द्वारा किये गए अहिंसक असहयोग के बारे में बताया तो महात्मा गाँधी तुरंत राजी हो गए चम्पारण चलने के लिए। शायद अहिंसक असहयोग के उदाहरण के प्रस्तुति का वह अद्धभुत संयोग था की जिसकी परिकल्पना महात्मा अपने ज़हन में कर रहे थे।

१९१७ के आरम्भ में गाँधीजी कलकत्ता गए पर संवाद के आभाव में उनका राज कुमार शुक्ल जी से संपर्क नहीं हो पाया। राज कुमार शुक्ल नें प्रयास ज़ारी रखा। ख़ैर, अप्रैल में महात्मा फिर कलकत्ता आए और १० अप्रिल को चम्पारण के जिला मुख्यालय मोतीहारी पहुँचे। उनके आवभगत के लिए आचार्य कृपलानी ( उस वक़्त मुज़्ज़फ़्फ़रपुर में आचार्य के पद पर स्थापित थे ), महादेव देसाई , दीन बंधु, सी एफ एंड्रयू, एच एस पोलॉक, डॉ राजेन्द्र प्रसाद , बृजकिशोर प्रसाद , अनुग्रह नारायण सिंह , रामश्री देव त्रिवेदी , धरणीधर प्रसाद तथा बिहार के अन्य गणमान्य व्यक्ति भी मौजूद थे। महात्मा गाँधी के चंपारण आने के बाद एक नए इतिहास की कायावत का लेखा तैयार होने लगी।

फोटोग्राफ क्रेडिट : mugup.info