• हे बनारस के प्रियजन, तनिक हमें भी सुन लीजिये

    हे बनारस के प्रियजन, तनिक हमें भी सुन लीजिये

    टीवी और राजनीति का खेल समझिये। आयातित कार्यक्रम और भव्यता बनारस की अपनी रचनात्मकता पर थोपी जा रही है। उसकी राजनीतिक सहजता समाप्त की जा रही है।बनारसी लोगों की राजनीतिक चेतना पर उनका बस न रहे इसके लिए आइटम खोजे जा रहे हैं। नए नए सीरीयल बन रहे हैं। जिनमें बनारस का सेट तो है मगर बनारस नहीं है।


  • क्या रेलवे में दो लाख से ज़्यादा नौकरियां कम कर दी गईं हैं…..

    क्या रेलवे में दो लाख से ज़्यादा नौकरियां कम कर दी गईं हैं…..

    सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या मोदी सरकार ने रेलवे में दो लाख से ज़्यादा नौकरियां कम कर दी हैं? यूपीए के समय से ही रेलवो की छंटनी होती आ रही है मगर 15 लाख से 13 लाख पर आ जाना, इतनी तेज़ी कभी नहीं देखी गई। मंज़ूर पदों की संख्या में ही दो लाख की कमी कर दी जाए तो क्या हाल होगा। सातवें वेतन आयोग की तालिका से पता चलता है कि रेलवे में कभी भी मंज़ूर क्षमता के बराबर भर्तियां नहीं हुई हैं। यूपीए के समय जब पहली जनवरी 2014 को मज़ूर क्षमता 15 लाख57 हज़ार थी तब 13 लाख 61 हज़ार ही लोग काम कर रहे थे। अब तो मंज़ूर क्षमता दो लाख कम कर दी गई है। अगर इसके नीचे लोग काम करेंगे तो रेलवे में नौकरियों की वास्तविक संख्या दो लाख से भी ज़्यादा घट जाएगी।







  • अरुणाचल प्रदेश के सीएम का सुसाइड नोट, कांग्रेस भाजपा एकीकरण का दस्तावेज़

    अरुणाचल प्रदेश के सीएम का सुसाइड नोट, कांग्रेस भाजपा एकीकरण का दस्तावेज़

    मगर राजनीति क्यों चुप है? क्या नहीं प्रधानमंत्री मोदी एक पूर्व मुख्यमंत्री के सुसाइड नोट के आधार पर कांग्रेस के नेताओं को घेर रहे हैं? क्यों नहीं कांग्रेस के नेता प्रधानमंत्री मोदी और अरुणाचल में पहला कमल खिलाने का गौरवगान कर रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना बना रहे हैं कि पुल ने अपने सुसाइड नोट में जिन नेताओं पर कथित रूप से 600 करोड़ के घोटाले के आरोप लगाए हैं, उनमें से एक उनका मुख्यमंत्री है। वो भाजपा की पहली सरकार का नेतृत्व कर रहा है। क्विंट और वायर ने इसकी रिपोर्टिंग करते वक्त एहतियातन नेताओं और जजों के नाम नहीं छापे हैं लेकिन अगर आप हिन्दी में टाइप किये गए इस सुसाइड नोट को छापेंगे तो जानने में मदद मिलेगी कि आप मूर्ख हैं जो इनके नेताओं की इस बात पर भरोसा करते हैं कि वे भ्रष्टाचार मिटा रहे हैं। कभी कभी अपनी मूर्खता का अहसास हो जाने में बुराई नहीं है।


  • रोज़गार के सवाल पर न मोदी ईमानदारी से बोल रहे हैं न अखिलेश

    रोज़गार के सवाल पर न मोदी ईमानदारी से बोल रहे हैं न अखिलेश

    31 जनवरी 2014 तक देश का कोई भी राज्य नहीं हैं जहां 85 प्रतिशत से कम गांवों का बिजलीकरण हुआ हो। उत्तर प्रदेश का आंकड़ा था 88.9 प्रतिशत। किसी को पता ही नहीं है कि जनवरी 2014 तक देश के आठ राज्य ऐसे थे जहां सौ फीसदी बिजली पहुंच गई थी। कम से कम इस किताब के दावे के अनुसार। पर अगर यह पूरी तरह से झूठ होता तो क्या प्रधानमंत्री सिर्फ 18000 गांवों में ही बिजली पहुंचाने की बात करते। इसका मतलब है कि साढ़े पांच लाख गांवों में बिजली पहुंचाई जा चुकी थी। प्रधानमंत्री को एक बात का शुक्रगुज़ार होना चाहिए। उन्हें भारत के इतिहास का सबसे आलसी विपक्ष मिला है।