• गेस्ट ब्लॉग : अनजानों से संवाद

    गेस्ट ब्लॉग : अनजानों से संवाद

    व्यक्तिगत तौर पर लगता है की इस नयी बदलती दुनिया में हम अपनों के पास होने के बावजूद पास वालों से दूर होते जा रहे हैं। एक तरफ हम कम्युनिकेशन एरा में जी रहे हैं और दूसरी तरफ संवाद भी नहीं कर रहे हैं। पता नहीं हम क्या बनना चाहते हैं और क्या बनते जा रहे हैं। शायद एक सतत इंसान बनने से अभी कोसों दूर हैं।



  • गेस्ट ब्लॉग : दूसरा दूरदर्शन ना बन जाए एफएम रेडियो

    गेस्ट ब्लॉग : दूसरा दूरदर्शन ना बन जाए एफएम रेडियो

    आज एफएम रेडियो में स्‍कोप बढ़ा है। मनोरंजन के नाम पर फूहड़ता, वक्‍त बिताने की कुछ वजहें परोसती आवाज़ें और उन पर ‘रेडियो जॉकी’ के चटकारे। क्‍या यह लेख लिखने के बाद मैं और पढ़ने के बाद आप यह उम्‍मीद करें कि आने वाला एफएम रेडियो, सिर्फ सरकारी कार्यक्रमों की सूचियां और ‘कड़वी दवा’ की मिठास नहीं परोसेगा।


  • गेस्ट ब्लॉग : अमरीका के आमिष

    गेस्ट ब्लॉग : अमरीका के आमिष

    आधुनिक अमेरका के बीच कुछ इतना पुराना सा कुछ देखने को मिलेगा ये सोचा नहीं था या ऐसे कहें की इन्होने आधुनिकता को रिजेक्ट किया है । आज जब हम बिजली के बिना जीवन नहीं सोच सकते , ये बिजली और इससे चलने वाली किसी भी मशीन का इस्तेमाल नहीं करते।



  • गेस्ट ब्लॉग : बर्तनों की अदला-बदली

    गेस्ट ब्लॉग : बर्तनों की अदला-बदली

    महानगर में रहते रहते यह सब कहाँ छूट गया। मेरा गाँव जैसे मेरे भीतर से बहार निकल रहा था। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी नए समाज में खड़ा था। बर्तनों की दुनिया मुझे घेरे खड़ी थी। सामाजिक सरोकारों के ये कौन से पैमाने थे ? जहाँ अपनापन एक कटोरी कढ़ी, एक लोटा आटा, और शगुन के कुछ रुपये के मजबूत आधार पर खड़ा हैं।