• तो फिर सवाल कौन पूछेगा

    तो फिर सवाल कौन पूछेगा

    हमारा कर्त्तव्य है सवाल पूछना . है न ? मगर इस पूरे संदीप कुमार SEX..

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  • बाढ़ में खुशी की खोज

    बाढ़ में खुशी की खोज

    तो बात यह है कि बाढ़ का रोना रोने वालों से कोसों दूर हम आज आपको दो गाँव की कहानी सुनाते हैं, जहाँ वैसे तो सैकड़ों एकड़ ज़मीन में लगी फ़सल पानी में समा गई है लेकिन तय समय पर राहत सामग्री पहुँच जाने की वजह से बाढ़ पीड़ितों के चेहरे पर रौनक़ लौट आई है। वैसे मुझे ‘पीड़ित’ शब्द लिखना अच्छा नहीं लगता है क्योंकि प्रकृति का अपना काम होता है, वह कुछ न कुछ करती रहती है। जिसे लोगबाग को स्वीकार करना चाहिए।


  • गेस्ट ब्लॉग : राष्ट्रवाद सावधान! राष्ट्रवाद विश्राम !

    गेस्ट ब्लॉग : राष्ट्रवाद सावधान! राष्ट्रवाद विश्राम !

    उस राष्ट्रवादी पत्रकार ने अंग्रेजी में दहाड़ते हुए कहा , “तो कहिये दोस्तों ऐसे पाकिस्तान प्रेमियों, आईएसआई परस्तों के साथ क्या सुलूक किया जाए ? क्या वक़्त नहीं आ गया है के उन्हें एक एक करके एक्सपोस किया जाए ?” मैंने सोचा के वाकई , क्या किया जाए ? क्या इन तमाम छद्म उदारवादियों को चौराहे पे लटका दिया जाए ? क्या उन्हें और उनके परिवारों को चिन्हित करके शर्मसार किया जाए ? क्या? कुछ दिनों पहले एक अन्य चैनल ने एक प्रोपेगंडा चलाया था जिसे “अफ़ज़ल प्रेमी गैंग” का नाम दिया गया। इन्हें देश विरोधी बताया गया। इन तथाकथित अफ़ज़ल प्रेमियो में से एक वैज्ञानिक गौहर रज़ा की मानें तो इसके ठीक बाद उन्हें धमकियाँ भी मिलने लगी।



  • गेस्ट ब्लॉग : विज्ञापन के इस दौर में गारंटी की इच्छा ?

    गेस्ट ब्लॉग : विज्ञापन के इस दौर में गारंटी की इच्छा ?

    अगर देश का प्रधानमंत्री यह खुद कहे की पता नहीं हैं कि विदेशों में कितना काला धन हैं तो बात कुछ हज़म नहीं होती। जितना हमने काला धन सोचा था, या बखान किया था, उतना हैं ही नहीं, या फिर हम ला नहीं सकते हैं। अगर यही बात सीधे कही जाती तो काफी बवाल हो जाता। परन्तु अगर भविष्य में ऐसी कोई बात आती हैं तो प्रधानमंत्री अपने सही इंटेंशन का हवाला देते हुए पतली गली से निकल लेंगे। कहीं प्रधानमंत्री की अनभिग्यता उस पतली गली के निर्माण की ओर पहला कदम तो नहीं।



  • गेस्ट ब्लॉग : गरीबों का रेल

    गेस्ट ब्लॉग : गरीबों का रेल

    गरीब आदमी कड़ी मेहनत करने के बावजूद साल दर साल अपने बीवी बच्चों के साथ छठ में घर जाने के लिए उसी जेनेरल डब्बे में कोचा के इसलिए सफर कर रहा है क्योंकि उसकी आर्थिक हैसियत नहीं बदल रही। उसके लिए आज भी अपने बीवी बच्चों के लिए बीस घंटे की सम्मानजनक यात्रा बहुत महँगी है।