भारतीयता और धार्मिकता के सियासी मतलबों से अलग रखिये योग को

“संसार में जितना कुछ सारतत्व का आविष्कार हुआ है, उसका अधिकांश योगबल से ही हुआ है। हम यहां पर योग शब्द को केवल भारत की साधन-प्रणाली विशेष से सीमाबद्ध करने का व्यर्थ प्रयास नहीं करेंगे। समस्त वैज्ञानिक और दार्शनिक आविष्कार योग के एकाग्रता साधन के ही फल हैं।“

लेखक का नाम नहीं है, परिचय में बस इतना कहा है कि ये जीवसेवक प्रतिष्ठात्यागी महात्मा हैं। जीवसेवक को धर्मसेवक नहीं कहा गया है। जीव किसी भी धर्म का हो सकता है। 1935 में गीताप्रेस ने एक विशेषांक योगांक निकाला था। योग को लेकर आरंभिक बहसों को समझने के लिए यह बहुत ज़रूरी किताब है। हर धर्म जीव और ईश्वर के बीच सीधे संपर्क की बात करता है ताकि वे धरती पर मौजूद चीज़ों के संग्रह और स्वामित्व के चक्कर में भटकते न रह जाएं। सारतत्व का आविष्कार सिर्फ हिन्दू धर्म में नहीं हुआ है। हर धर्म का सार है और कई धर्मों का सार भी एक ही है। सभी में इस पर ज़ोर दिया है कि सांसारिक और शारीरिक लालसों को वश में कर खुद को परमात्मा के मिलन के मार्ग पर झोंक दो। मुक्ति और आनंद वहीं हैं।

इन्हीं सार-तत्वों की एकरूपता सभी धर्मों के लक्ष्य को एक करती है। उनके बीच एकता कायम करती है। योग क्या है शीर्षक लेख में समस्त वैज्ञानिक आविष्कारों को योग का फल बताने का क्या मकसद है। वैज्ञानिक आविष्कार तो दुनिया भर में हुए हैं। अगर वे योग का फल हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि हमारी समझ वाले योग से अनजान कोई वैज्ञानिक अपनी साधना में लगा हुआ था। योग कर रहा था। क्या इसका मतलब यह भी हुआ कि योग में योगदान उस वैज्ञानिक का भी है जो भारतीय नहीं है। वैज्ञानिक आविष्कार वैसे भारत के हिस्से में कम ही आते हैं। योग को भारत की साधन-प्रणाली बताने का व्यर्थ प्रयास नहीं करने वाले महात्मा जी यह भी कहते हैं-

“ताबीज़, कवच, आदि के द्वारा जो लोगों के कर्मफल का खण्डन करने की हिमाकत रखते हैं, जो वन्धया को पुत्र प्राप्ति के लिए दवा देते हैं और रोगियों का रोग दूर करने के लिए की बात करते हैं, वे भी आजकल योगी कहे जाते हैं और पूजित होते हैं। “

योगांक में ही परमपूज्यपाद श्रीउड़ियास्वामीजी महाराज ने लिखा है कि मैंने आसाम से भूटान आदि प्रान्तों में हठयोगियों की बहुत खोज की। मैंने ऐसे कई हठयोगी देखे हैं जिन्हें चार-चार घंटे की समाधि होती थी परन्तु उनकी वास्तविक स्थिति का पता लगाने पर यही विदित हुआ कि उनमें से किसी को भी समाधि सिद्ध नहीं हुई है। मैंने प्राय सभी हठयोगियों को रोगी भी पाया है। उनमें ध्यान और वैराग्य की कमी है इसलिए आधुनिक हठयोगी प्राय अर्थलोलुप और चंचल प्रकृति के देखे जाते हैं।

1935 के आदर्शवादी दौर में भी ये विद्वान योग और योगियों के पतन पर चिन्ता कर रहे थे। वे क्यों चाहते थे कि योगी धन संचय और चमत्कारी न हो। ज़ाहिर है उन्हें योग के नाम पर ठगी और वसूली से पीड़ा हो रही थी। आज जब 2015 के साल में योग पर दैनिक चर्चाएं हो रही हैं तो क्या हम ऐसे सवालों से टकरा रहे हैं। हमने मान लिया है कि योग में सब ठीक है। योग तो ठीक है ही लेकिन उसका अभ्यान बताने वाले क्या योग की मर्यादा का पालन करते हैं।

आज चैनलों पर हिन्दू बनाम मुस्लिम के दायरे में योग को लेकर बहस हो रही है क्योंकि इससे राजनीति सधती है। योग का धर्म से कोई संबंध ही नहीं है।  कल्याण के 680 पन्नों के अंक को पढ़ते हुए मुझे कहीं नहीं लगा कि क्यों स्वामी, कोई महात्मा ऐसी दावेदारी कर रहे हैं, आज क्यों ऐसा लग रहा है। वे योग को धर्मविशेष के चश्मे से भी नहीं देखते। 1935 में गीताप्रेस योग के विश्वरूप पर अंक निकाल सकता है तो आज हम क्यों और किससे भयभीत हैं। योग डरपोक नहीं बनाता है। योग आपको किसी दल के अधीन नहीं करता है। योग के नाम पर किसी धार्मिक राजनीतिक विचारधारा का प्रोपेगैंडा नहीं किया जाना चाहिए। योग की उत्पत्ति धर्म की आधुनिक समझ पर छपी किताबों के किसी भी पन्ने से नहीं होती है।

“योगी सर्प, मेढक आदि जन्तुओं से आसन, मुद्रा, प्रणायाम आदि योगांकों को सीखकर अपने स्वास्थ्य और आयु की वृद्धि करने में समर्थ हुए थे। प्राचीन ऋषियों की, ईसा आदि महात्माओं की योगबल से रोगियों के रोग दूर करने की बात प्रसिद्ध ही है। योगबल के साधक ईर्ष्या-द्वेष, सुख-दुख, शत्रु-मित्र से दूर होकर शान्तचित्त होकर किस प्रकार पृश्वी पर शांति राज्य स्थापित करने में सहायक हुए थे इसके ज्वलंत उदाहरण हैं- शंकर, ईसामसीह, बुद्ध इत्यादि। “( पेज- 73)

आज योग को भारतीयता की पहचान बताते हुए हिन्दुत्व से जोड़ने का प्रयास हो रहा है। पहले हिन्दुत्व और भारतीयता को एक कहा गया अब योग के बहाने भारतीयता की बात हो रही है। जबकि योग का कभी दावा नहीं रहा कि वो किसी की सत्ता को बनाए या बचाए रखने के लिए साधन बनेगा। हमें पूछना चाहिए कि क्या हम योग के स्वरूप को जानते हैं। ट्वीटर पर हैशटैग चला देने या हठयोग के एक दो आसनों का प्रदर्शन कर सबको चौंका देना योग नहीं है। योग को लेकर कितनी सार्थक दार्शनिक बहस हो सकती थी लेकिन इसे आसनों के पैकेज में बदल दिया गया है। योगी वही चमत्कार करता हुआ दिख रहा है जिसकी चेतावनी योग पर विचार करने वाले महात्माओं ने समय समय पर जारी की है। क्या योग को तमाम परंपराओं से अलग किया जा रहा है।

कल्याण के इस अंक में एक लेख है- ईसाई-घर्म योग का स्थान। रेवेरण्ड एडविन ग्रीब्ज ने लिखा है। ईसाई धर्म में भी परमात्मा से एकाकाकार हो जाने पर ज़ोर दिया गया है। ग्रीब्ज लिखते हैं कि उपदेश कार्य आरम्भ करते समय ईसामसीह ने चालीस दिन का उपवास किया था ऐसा वर्णन मिलता है, किन्तु उन्होंने इस तप को किसी साधन के रूप में किया हो ऐसा मालूम नहीं होता, बल्कि कुछ समय तक वह अकेले जंगल में रहे और वहां अपने भावी उपदेश कार्य की सोच में इतने तल्लीन हुए कि उन्हें खाने-पीने की सुध न रही। ईसाई धर्म में योग के होने की धारणा पर लंबी बहस है। हमारे महात्माओं ने भी इस पर खूब चर्चा की है लेकिन क्या इस उदारता का ज़रा सा भी लक्षण मौजूदा दौर में देखने को मिल रहा है।

इसी अंक में कबीर योग का ज़िक्र है। वही कबीर जिन्होंने हिन्दू और मुसलमान के नाम पर अलग अलग होने को लेकर कितना तंज किया है। बौद्ध, जैन योग पर भी विस्तार से एक लेख है। सारे योग का मूल अर्थ और उसकी अन्तिम परिणति भगवान के साथ प्रेम मिलन में है। तो क्या इस लिहाज़ से सूफ़ी योगी नहीं हुए। नमाज़ी योगी नहीं हुआ या इस्लाम में योग नहीं हुआ। योग की विधि क्या सिर्फ आसन है। मेरे ख़्याल से योग का इससे ज़्यादा संकुचित रूप नहीं हो सकता। कल्याण के योगांक में श्री एरच जहांगीर तोरापोरवाला का लेख है जो ज़रथोस्ती धर्म में योग की तलाश करते हैं। पारसी धर्म में भी ज्ञान, भक्ति और कर्म के जो मार्ग बताये गए हैं वो योग के ही हैं, भले ही हमारे बचे हुए गंर्थों में योग शब्द का इस्तमाल नहीं हुआ हो ।

ऐसा कौन सा दर्शन है जिसका एक रूप परिवर्तित होकर दूसरे धर्म में नहीं दिखता। वो लोग कौन थे जो सभी धर्मों का सार एक ईश्वर की प्राप्ति में देखते रहे और बता गए कि ईश्वर एक है। ये लोग कौन है जो सभी धर्मों के ईश्वर को अलग-अलग बताने में लगे हुए हैं। मेरा मतलब यह भी नहीं कि योग भारतीय नहीं है, योग की कल्पना भारतीय दर्शन और सिद्धांतों के बग़ैर नहीं की जा सकती लेकिन हम योग की विविधता पर बात क्यों नहीं कर रहे हैं। योग आपको धार्मिक नहीं बनाता है। बल्कि कर्मकांडों से मुक्त कर अपने भीतर परमात्मा के दर्शक करने की शक्ति देता है।

उस शक्ति को आप टीवी देखकर या किसी योगी की बनाई सीडी देखकर हासिल नहीं कर सकते हैं। साधना और समाधि की बात क्यों नहीं होती है। योग का अर्थ चेतना के जागृत स्तरों को भी हासिल करना है। महर्षि अरविन्द ने लिखा है कि कोई मनुष्य कभी इस मार्ग पर पैर न रखे जिसको यह निश्चय न हो कि हमारे अंतरात्मा की यह पुकार है और इस मार्ग पर अंत तक चलने की हमारी तैयारी है।

“मैं यानी यह छोटा अहंकार प्रकृति की रचना है और साथ ही मानसिक, प्राणगत और भौतिक रचना भी है। जब सदात्मा मिल जाता है तब अहंकार का काम पूरा हो जाता है फिर उसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है। अंत हो जाता है। “

महर्षि अरविन्द के यह विचार उनकी पुस्तक लाइट्स आफ योग से लेकर कल्याण ने छापा है। आज योग की बात करने वाला हर दूसरा योगी मैं से ग्रस्त है। योग का झंडा लेकर घूमने वाले राजनेताओं को मैं का रोग लगा हुआ है। ज़ाहिर है वे आसनों में तो निपुण होंगे मगर योग के विचारों में नहीं। योग कहां नहीं है। व्याकरण, गणित और निर्माण में है। हाइड्रोजन और आक्सीजन के मिलने में भी योग है। काठ का काठ से मिलन होकर कितनी चीज़ें बन जाती हैं वहां भी तो योग है। इसलिए योग की व्यापकता को आप किस दल या किसी धर्म की पहचान से मत जोड़िये। योग कीजिए मगर तोंद पचकाने के लिए नहीं बल्कि आत्मा और परमात्मा को जानने के लिए भी। योग करते रहिए।