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  • बाढ़ में खुशी की खोज

    बाढ़ में खुशी की खोज

    तो बात यह है कि बाढ़ का रोना रोने वालों से कोसों दूर हम आज आपको दो गाँव की कहानी सुनाते हैं, जहाँ वैसे तो सैकड़ों एकड़ ज़मीन में लगी फ़सल पानी में समा गई है लेकिन तय समय पर राहत सामग्री पहुँच जाने की वजह से बाढ़ पीड़ितों के चेहरे पर रौनक़ लौट आई है। वैसे मुझे ‘पीड़ित’ शब्द लिखना अच्छा नहीं लगता है क्योंकि प्रकृति का अपना काम होता है, वह कुछ न कुछ करती रहती है। जिसे लोगबाग को स्वीकार करना चाहिए।


  • गेस्ट ब्लॉग : राष्ट्रवाद सावधान! राष्ट्रवाद विश्राम !

    गेस्ट ब्लॉग : राष्ट्रवाद सावधान! राष्ट्रवाद विश्राम !

    उस राष्ट्रवादी पत्रकार ने अंग्रेजी में दहाड़ते हुए कहा , “तो कहिये दोस्तों ऐसे पाकिस्तान प्रेमियों, आईएसआई परस्तों के साथ क्या सुलूक किया जाए ? क्या वक़्त नहीं आ गया है के उन्हें एक एक करके एक्सपोस किया जाए ?” मैंने सोचा के वाकई , क्या किया जाए ? क्या इन तमाम छद्म उदारवादियों को चौराहे पे लटका दिया जाए ? क्या उन्हें और उनके परिवारों को चिन्हित करके शर्मसार किया जाए ? क्या? कुछ दिनों पहले एक अन्य चैनल ने एक प्रोपेगंडा चलाया था जिसे “अफ़ज़ल प्रेमी गैंग” का नाम दिया गया। इन्हें देश विरोधी बताया गया। इन तथाकथित अफ़ज़ल प्रेमियो में से एक वैज्ञानिक गौहर रज़ा की मानें तो इसके ठीक बाद उन्हें धमकियाँ भी मिलने लगी।


  • पुलिस के एक और अधिकारी द्वारा मेरे पत्र का एक समुचित जवाब

    पुलिस के एक और अधिकारी द्वारा मेरे पत्र का एक समुचित जवाब

    प्रिय रवीश जी, मैं ना तो आपकी तरह बेहतरीन लेखन कर सकता हूँ और ना ही आपके द्वारा लिखे गए भावो का खण्डन करना चाहता हूँ। पर कुछ ज्यादा ही निराश हो चुके आपके विचारों को थोडा सा संतुलन देना चाहता हूँ।साहब, ये सही है कि भारतीय पुलिस सेवा में कमियां हैं जिसमे मुकुल द्विवेदी की शहादत पर हम चुप होकर, इसे सर्वोच्च बलिदान नाम देकर भूल रहे है। लेकिन ये सर्वोच्च बलिदान ही हमें इस सड़ी हुई व्यवस्था में आशा की किरण दिखाता है।


  • भारतीय पुलिस सेवा (उत्तर प्रदेश) के अधिकारी द्वारा मेरे पत्र का एक समुचित जवाब

    भारतीय पुलिस सेवा (उत्तर प्रदेश) के अधिकारी द्वारा मेरे पत्र का एक समुचित जवाब

    प्रिय रवीश जी, आपका ख़त पढ़ा । उसमें सहमत होने की भी जगह है और संशोधनों की भी ।यह आपके पत्र का जबावी हमला कतई नहीं है । उसके समानांतर हमारे मनो-जगत का एक प्रस्तुतीकरण है । मैं यह जवाबी खत किसी प्रतिस्पर्धा के भाव से नहीं लिख रहा हूँ । चूँकि आपने भारतीय पुलिस सेवा और उसमें भी खासकर (उत्तर प्रदेश) को संबोधित किया है, इसलिए एक विनम्रतापूर्ण उत्तर तो बनता है । यूँ भी खतों का सौंदर्य उनके प्रेषण में नहीं उत्तर की प्रतीक्षा में निहित रहता है।


  • गेस्ट ब्लॉग : हाल कैसा है जनाब का

    गेस्ट ब्लॉग : हाल कैसा है जनाब का

    देश के किसी भी बड़े शहर में गम्भीर रूप से बीमार पड़ना एक पाप से कम नहीं है। हाल ही में अपने कुछ प्रियजनों को इस आग के दरिए से गुज़रता पाया तो समस्या की गहराई ज्ञात हुई। दिल्ली शहर में छोटे-बड़े, सरकारी एवं ग़ैर सरकारी सैकड़ों अस्पताल हैं। नरसिंग होम तो अनगिनत हैं। आप पाऐंगें कि आज जहाँ मोमो का ठेला है, कल वहाँ एक नरसिंग होम उग जाएगा।