अमरीका में ग़रीबी है या ग़रीबी जैसी है

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अमरीका एक धारणा है । चश्मा है । इसे पहनते ही हम उसे अच्छा बुरा देखने समझने लगते हैं । उसकी विदेश नीतियाँ तीसरी दुनिया के देशों में बहुत सराही नहीं जाती । वो शक की निगाह से देखा जाता है मगर वो लाखों लोगों का सपना भी है । हमारे दिलो दिमाग़ पर अमरीका कई तरह से क़ायम है । उसकी संस्थाएँ अगर सबको बराबरी का मौका देती हैं तो उसकी दूसरी तरह की संस्थाएँ ग़ैरबराबरी का प्रसार भी करती हैं । पूँजी का जश्न तो यहाँ से कोने कोने में पहुँच जाता है मगर शोक जहाँ होता है वहीं कोई कोना ढूँढ कर रह जाता है ।

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सिर्फ चार से पाँच मील की दूरी तय की थी । वाशिंगटन डीसी की चकाचक सड़कें और रौशन दुकानें हम तीसरी दुनिया वालों की आह और वाह का सबब बन जाती हैं । राजधानी के केंद्र से हम कोई डेढ़ मील ही चल पाए थे कि ग़रीबी की उदासी पसरी नज़र आने लगी । अब सड़कों को देखकर लगने लगा कि ग़ाज़ियाबाद का इंजीनियर भले भ्रष्टाचार में आगे हो मगर ख़राब सड़क बनाने की समझ उसकी उतनी ही है जितनी वाशिंगटन वाले की होगी । कार के नीचे से खटपट की आवाजें आने लगी। गाड़ी कभी हचका खा रही थी तो कभी गचका भी । टूटी सड़कें नज़र आ रही थीं । हम अब उन इलाक़ों में घूम रहे थे जिसे यहाँ नेबरहुड कहते हैं । डीसी से उत्तर पूर्वी इलाक़ा ।

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अगर आप तीसरी दुनिया की निगाह से देखेंगे तो ये मकान भी अमीरों के बंगले जैसे दिखेंगे । यहाँ भी ग़रीबी है मगर पैमाना अलग होगा । ये मकान बाहर से ख़ूबसूरत लगते हैं क्योंकि एक जैसे बने हुए हैं । इनकी डिज़ाइन में समरूपता है और सब एक क़तार में हैं । सड़कें चौड़ी हैं और कारें भी हैं लेकिन अपेक्षाकृत पुरानी । पुराने टायर के बोर्ड लगे हैं । आप कह सकते हैं कि निम्न मध्यमवर्गीय इलाक़ा है । जिसके कई मकानों से ग़रीबी झांकती रहती है । खिड़की टूट गई है तो कार्डबोर्ड लगा दिया गया है । दरवाज़ों पर सेलो टेप चिपकाया गया है । छज्जे टूटे हुए हैं । बाहर बरामदे में पुराने सोफ़े हैं और घास की सफाई नहीं हुई है । ऐसा लगता है कि सीढ़ियों और अहाते की सफाई कई दिनों से नहीं हुई है । कचरे के डिब्बे भरे पड़े हैं । देखकर लगा कि यहाँ भी नियमित सफाई नहीं होती है ! सड़क के किनारे कचरा बिखरा पड़ा है ।

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राजधानी की भव्य इमारतों का असर अब उतरने लगा है। सड़कों में दरारें है । गड्ढे हैं । सतह की चिकनाई गायब है । ऐसा लगता है कि वाशिंगटन डीसी से निकल कर ग़ाज़ियाबाद के वैशाली की सड़कों पर आ गया हूँ । फिर भी वैशाली की सड़कें बेहतर लगीं । कहीं कहीं सड़के बन रही हैं मगर काम उस अंदाज़ में होता नहीं दिखता जैसा हम अमरीका के बारे में सोचते हैं । पता चलता है कि थोड़ा काम हुआ है और बंद हो गया है ।

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सभी घरों के दरवाज़े बंद हैं । खिड़की से कुछ लोग झाँकते दिखे । अहसास हुआ कि ये अमरीका के पैमाने से ग़रीब लोग हैं । मोहल्ले के कार्नर पर नौजवानों का समूह जुआ खेलते, शायद नशा करते दिखता है । वैसे ही जैसे हम दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय बस अड्डे के पास देखते हैं । इन नौजवानों की आँखों में कोई रौनक़ नहीं है । इनके कपड़ों से पता चलता है कि पर्याप्त नहीं है और पुराने भी हैं । ये सभी अश्वेत हैं । ब्लैक । बेरोज़गारी दिखती है ।

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हम एक मोहल्ला से होते हुए दूसरे में चले जा रहे हैं । अब देखते देखते पता चलने लगा है कि अमरीका की हकीकत वैसी नहीं है । सुपर पावर के आँगन में ग़रीब नौजवानों और बुज़ुर्गों की हालत तीसरी दुनिया के जैसे लगती है । ग़रीबों के लिए कोई सुपर पावर नहीं होता है । टीवी गरीब विरोधी है । जैसा कि भारत में भी है । टीवी के चमकदार सेट और एंकरों के कपड़े से लेकर फ़िटनेस तक नकली सच्चाई की रचना करते हैं । ग़रीबी और क़र्ज़ लेकर कालेज की फ़ीस भरने का विरोध करने वाले बर्नी सैंडर्स का एंकर मज़ाक़ उड़ाते हैं । जब मैं यह सब लिख रहा हूँ तब बर्नी सैंडर्स ने न्यू हैम्पशायर में हिलेरी क्लिंटन को हरा दिया है । उसकी जीत का जश्न नहीं है मगर हिलेरी के बयानों को प्रमुखता से फ़्लैश किया जा रहा है कि मैं एक एक वोट के लिए लड़ूँगी । टीवी पर खाए अघाए लोगों के पतला होने, चमड़ी को चिकना करने और पतला होने और जो बहुत पतला है उसे कुछ मोटा होने की चर्चा चल रही है । वैसे अमरीकन चैनलों पर सर्कस के भी विज्ञापन आते हैं ! मौत क कुआँ । काफी महँगा टिकट होता है । पंद्रह डॉलर का । इसलिए कहता हूँ टीवी को अपना समझने से पहले सोच लीजियेगा । ये तभी तक आपका है जबतक आपके पास टीवी देखने और इसके विज्ञापनों के सामान ख़रीदने की क्षमता है ।

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इन इलाक़ों से घूमते हुए असमानता पर थामस पिकेटी की किताब के पन्ने ज़हन में खड़खड़ाने लगते हैं । पिछले साल अर्थशास्त्र में नोबल पुरस्कार एंगस डीटन को मिला था । डीटन भी असमानता की बात करते हैं । पूँजी ने जरूर आबादी के बड़े हिस्से को संपन्न बनाया है । प्रतिभा का एक छद्म संसार रचा है जहाँ तरह तरह की विविधताएँ हैं । मगर यह कैसे और क्यों हैं कि वाशिंगटन डीसी से चंद मील दूरी पर उसके अपने ही लोग छूट गए हैं ।

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मैं व्हाईट हाउस से सिर्फ तीन चार किमी दूर ही तो आया हूँ । मुझे अर्थव्यवस्था के दूसरे मॉडलों का ज्ञान नहीं है लेकिन अगर यही एकमात्र सफल मॉडल है तो इतने लोग ग़रीब कैसे रह गए । उनके लिए अवसर कैसे नहीं हैं । जो अमीर है वही क्यों अमीर होता जा रहा है । पूँजीवाद में अमीर कैसे ख़ानदानी हो गए । क्या ये ज़मींदार या सामंत नहीं हैं । अगर पूँजी सिर्फ प्रतिभा की देन है तो इसे तो हर दूसरे दिन अपना ठिकाना बदल लेना चाहिए । अरे भाई हम कम्युनिस्ट नहीं हैं । पूछ रहे हैं बस ।

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एक पेट्रोल पंप पर हम रूकते हैं । एक कार आती है जिसके बाहरी हिस्से को सेलोटेप से चिपकाया है । वहीं एक जनरल स्टोर है जिसके भीतर लाटरी की मशीनें लगी हैं जहाँ गरीब लोग अमीर होने का जुआ खेलते हैं । दिल्ली में तो बहुत साल पहले लाटरी बंद हो गई । अमरीका में क्यों है भाई ? पूरे इलाक़े में उदासी दिखती हैं । घर हैं मगर चहल पहल नहीं है । साइकिल चोरी यहाँ भी होती है !

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हम घूमते हुए यहाँ की मंडी में आते हैं । दिल्ली की गाज़ीपुर मंडी कई गुना बेहतर लगी । हम नाहक अपनी चीज़ों को कमतर निगाह से देखते हैं । दरअसल हम अमरीका या विकसित देशों की विशालकाय इमारतों, बेहतरीन बुनियादी ढाँचों की चमक में जल्दी खो जाते हैं । चौड़ी और बत्तियों से सज़ी सड़कों से इतना प्रभावित हो जाते हैं कि हमें लगता है कि उपलब्धि इसी को कहते हैं । ख़ैर मंडी में बहुत रौनक़ तो नहीं दिखी । शायद वो चहल पहल का वक्त नहीं रहा होगा । पर तस्वीर देखकर बताइये कि इसमें क्या हाईटेक है । गाज़ीपुर मंडी भी तो ऐसी ही दिखती है । थोड़ी गंदी दिखती होगी यही न ।

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एक टिन शेड वैसा ही टूटा दिखा जैसा भारत में दिख जाता है । आप नीचे की तस्वीर देखकर अंदाज़ा लगा सकते हैं, किसी ने बताया कि यहाँ बाज़ार के वक्त लेन देन का हिसाब होता है । हम औपचारिक रूप से पुष्टि नहीं कर सके फिर भी ऐसी टिन शेड की मौजूदगी वाशिंगटन की चमक उतार तो रही ही थी । यक़ीन जानिये दिल्ली की मंडियाँ वाशिंगटन डीसी की मंडी से बेहतर हैं । अगर आप महाराष्ट्र के बारामती की मंडी देखेंगे और यहाँ की मंडी से तुलना करेंगे तो पता चलेगा कि हम भी कुछ मामलों में बहुत आगे हैं ।

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धारणा है कि अमरीका में लोग चार दिन में कार बदल देते होंगे । बदलते भी होंगे मगर तमाम कारों के बीच ऐसी बहुत सी कारें दिखती हैं जो कई साल पुरानी हैं । उनके मॉडल पुराने हैं । लगता है कि कार वाला कार ख़रीद के भी जहाँ था अपनी कार के साथ वहीं रह गया है । कहीं नहीं पहुँच सका है । पता चलता है कि कैसे व्यवस्था के नाम पर लोगों को विस्थापित किया है । अगर बीच शहर में सबको रेहड़ी पटरी लगाने की इजाज़त होती तो सब कुछ न कुछ कमा खा लेते ।

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ये तस्वीर सोशल सिक्योरिटी डिपार्टमेंट की है । भारत में भी सामाजिक न्याय के विभाग ऐसे ही दिखते हैं । यहाँ से ग़रीबों को भत्ता वगैरह दिया जाता होगा। कहते हैं कि यूरोप और अमरीका का यह सिस्टम कई मायनों में अच्छा है । भारत में भी होना चाहिए । बातचीत से पता चला कि अमरीका में खाने पीने की बुनियादी चीज़ों के दाम कई सालों से नहीं बढ़े हैं । अमरीका अपनी ग़रीबी भले न दूर कर पाया हो मगर दुनिया की ग़रीबी दूर करने के लिए कितने पैसे दान या कर्ज पर देता है ।

अब हम वाशिंगटन डीसी की तरफ आ गए हैं । इस बार राजधानी की सड़कों को ग़ौर से देखने लगता हूँ । खटखट की अावाज़ सुनाई देने लगती है । दरारें दिखनी शुरू हो जाती है । फ़्लाई ओवर और पुल पर जंग दिखने लगते हैं । अब मैं अमरीका को अमरीका की तरह नहीं देख रहा हूँ । यहाँ की गाड़ियों में झूठमूठ के दसियों बत्तियाँ फ़्लैश करती रहती हैं । बर्फ हटाने वाली एक गाड़ी के चारों तरफ इतनी बत्तियाँ क्यों फ़्लैश करती हैं ? इनकी वाक़ई ज़रूरत है या दबदबा क़ायम करना है कि देखिये ताक़तवर होना इसे कहते हैं । ओबामा साहब मिलते तो कहता कि सर आपके यहाँ भी सड़के वैसी ही हैं बल्कि हमारे यहाँ की जैसी हैं ! दिल्ली की सड़के कहीं बेहतर हैं भाई ।