अकबर- इतिहास के नायक को साहित्य के फ्रेम में देखने का शानदार मौक़ा

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अकबर एक उपन्यास है। लिखने वाला इतिहास का विद्यार्थी रहा है। इतिहास के किरदार पर लिखे इस साहित्य को लेखक ने एक इतिहासकार को समर्पित किया है। मुमकिन है कि इतिहासकार शाहिद अमीन के पिता प्रोफेसर अमीन की कक्षा में बैठा यह छात्र इतिहास को कल्पनाओं के सहारे समझ रहा हो। वो पढ़ते पढ़ते उस दौर में भटक जाया करता हो, जिसके अवशेष उसकी ज़िंदगी के आस-पास कई शक्लों में नज़र आते हों। उस दौर की बहुत सी चीज़ें आज भी बची हैं।नाम,शब्द,खान-पान, पहनावा और यादें। आज भी कई ज़हीन लोग उसी अंदाज़ में उन सलीक़ों को बचाये हुए हैं। जब कोई बड़ा नोट टूटता है तो वो छोटे छोटे सिक्कों में तब्दील होकर उसी नोट की विरासत को ढो रहा होता है। इन बची हुई चीज़ों को जमा करने में कोई बीस साल का सब्र करे और धीरे धीरे जोड़ता हुआ उस दौर का एक मुकम्मल सा ख़ाका खींच दे,तो भरोसा किया जा सकता है कि शाज़ी ज़मां ने किस जुनून की बद तक अपने किरदारों को परखा होगा। एक घोर ऐतिहासिक चरित्र और दस्तावेज़ को साहित्य में बदलने का एक ख़तरा है। पढ़ने वाला हमेशा इतिहास की कसौटी पर कसेगा। लिखने वाला चाहे जितना भी साहित्य की कसौटी पर कसे जाने की मांग करता रहे। हम सब अकबर को इतिहास की किताबों से जानते हैं। साहित्य का किरदार तो वह अब हुए हैं। लेखक का दावा है कि इस उपन्यास में एक एक बात इतिहास के क़रीब है फिर साहित्य कहाँ होगा? लिहाज़ा इस क़िताब की कामयाबी इस बात से तय होगी कि एक साहित्यिक किरदार के रूप में अकबर अपनी बादशाहत को छू पाते हैं या नहीं या फिर उससे बाहर आकर वे विशेषणों के अकबरीयत से कितना मुक्त हो पाते हैं ।

341 पन्नों का उपन्यास है, 127 वें पन्ने पर पहुंच कर इसकी समीक्षा जैसी कोई चीज़ लिखने की गुस्ताख़ी नहीं करना चाहता। न तो यह किताब की समीक्षा है और न ही अकबर का विश्लेषण। ज़ाहिर सी बात है कि इस पाठक को अंदाज़ा नहीं है कि 128वें पन्ने से अकबर का किरदार कैसा मोड़ लेता है। यूं समझिये कि अकबर किताब के बारे में प्राथमिक सूचना है। शाज़ी ज़मा की क़लम की नीयत बहुत साफ़ लगती है। वे चाहते तो इतिहास की किताबों में दर्ज अकबर को ही अंतिम सूचना मान सकते थे। इतिहास की किताबों में अकबर की कोई कमी नहीं है। किसी उपन्यास में यह पहला अकबर है। शाज़ी उस दौर के लहज़े के करीब़ जाकर अकबर को बयां करते हैं। हबीब और निज़ामी की दिल्ली सल्तनत इस मिज़ाज को छूती है मगर अकबर काफी अलग है। साहित्यकार आदतन टीवी का पत्रकार है इसलिए लिखने से ज़्यादा देख रहा है। बल्कि देखते-देखते लिख रहा है। अकबर पढ़ते हुए आपको बहुत सी आवाज़ें सुनाईं देंगी। बहुत कुछ दिखाई देगा।

अब तक पढ़े पन्नों में मैंने जिस अकबर को देखा है, उसके बारे में वक्त मिलते ही फिर से लिखूंगा। राजकमल प्रकाशन से छपी यह किताब सजिल्द वाली 799 रूपये की है और पेपरबैक वाली 350 रुपये की है। ऑनलाइन मिल रही है। किताब की ज़िल्द सादगी से भरी है मगर आहट भव्यता की है। एक बादशाह के आमद की सूचना कवर पर इस तरह टंकित है। “एक बादशाह जिसकी तलवार ने साम्राज्य की हदों को विस्तार दिया, जिसने मज़हबों को अक़्ल की कसौटी पर कसा, जिसने हुकूमत को नए मायने दिये, उसी बादशाह की रूहानी और सियासी ज़िंदगी की जद्दोजहद का सम्पूर्ण ख़ाका पेश करता एक अभूतपूर्व उपन्यास।“ संपादन सत्यानंद का है और कवर की डिज़ाइन मुझे बहुत पसंद आई है। पढ़ने के लिए पैसा ही नहीं धीरज भी चाहिए। मैं पूरा पढ़ने से पहले बेहतरीन नहीं कहना चाहता मगर अंदाज़ा है कि एक बेहतरीन उपन्यास से गुज़र रहा हूं।

बादशाह अकबर गालियां देते थे। हम बादशाह को ज़रूरत से ज़्यादा तय फ्रेम में देखने के आदी रहे हैं। हो सकता है सिनेमा और मौजूद किलों और मक़बरों के कारण हम भव्यता में ही देखने की आदत के शिकार हो गए हों। शाज़ी ज़मां का अकबर अधम ख़ान को मारते वक्त गाली देता है तो अकबर का शाही वृतांत कुछ समय के लिए धाराशायी हो जाता है। मैं उस प्रसंग को हू-ब-हू लिख रहा हूं।

उसी वक्त बादशाह सलामत की नज़र अधम ख़ान कोका पर पड़ी जो उनकी तरफ़ ही आ रहे थे। आगबबूला होकर बादशाह सलामत ने हिंदुस्तानी में पूछा, “गांडू तूने हमारे अतका को क्यों मारा?”

यक़ीन जानिए,पढ़ते ही दिमाग़ सन्न हो गया। ऐसे लगा जैसे अकबर पर कोई बहुत ही भव्य फिल्म देख रहे हों और एडिटिंग में चूक के कारण शूटिंग के दौरान दी जाने वाली कोई भयंकर सी गाली पार्श्व धुन के साथ सुनाई दे गई हो। सदमा ऐसा था कि यह सोचकर कांप गया कि सिनेमा में भारतीय संस्कृति के अंतिम प्रहरी पहलाज निहलानी साहब से ये चूक कैसे हो गई। भारत के आला सरकारी सिनेमा संपादक अर्थात सेंसर बोर्ड के मुखिया की कैंची क्या उस वक्त बादशाह सलामत के लिए तैयार हो रहे शामियाने के सेट पर खो गई होगी। तभी फुटनोट में शाज़ी ज़मां दावा करते हैं कि ये गाली सौ फ़ीसदी अकबर की ज़बान से निकली थी। ये इतिहास में दर्ज है। राजनीतिक रूप से सही शब्दावली के आज के दौर में अकबर की इस गाली का विश्लेषण अलग से किया जाना चाहिए। यह गाली अकबर को समझने का एक नया ही फ्रेम है। आगे के पन्नों में अकबर हरामज़ादा और बकवास का भी इस्तमाल करते हैं। कोड़े मारते हैं और अपने विश्वस्त मान सिंह को पटक कर मारने लगते हैं। अकबर इन पलों में बादशाह के आडंबर से छिटक कर बाहर आ जाते हैं।

मैं भी इतिहास का विद्यार्थी रहा हूं। फुटनोट पढ़ते ही अपनी करवटों को अकबर पर पढ़ी तमाम किताबों के पन्नों के साथ बदलने लगा। आख़िर इतिहासकार ने ये क्यों नहीं बताया कि गाली किसने दर्ज की। अकबर गाली देते थे? उस वक्त की और क्या क्या गालियां थीं? क्या ये गाली जो अकबर ने दी, वो चार सौ साल से ज़्यादा पुरानी है? भारत की सबसे पुरानी या प्राचीन गाली कौन सी होगी? जैसे इतिहास की कक्षा में पढ़ते पढ़ते अकबर के लेखक अपनी कल्पनाओं में भटक गए होंगे, मैं भी गाली दर्ज किये जाने के इस दौर में भटक गया।

एक और प्रसंग सुनते हैं। बादशाह सलामत अकबर ख़्वाजा मुअज़्ज़म का पीछा करते हुए नाव से यमुना नदी पार कर जाते हैं। इस प्रसंग को पढ़ते हुए लगा कि मैं लोहे वाली शाहदरा पुल के नीचे खड़ा हूं और बादशाह अकबर को नाव पार कर सीलमपुर की तरफ जाते देख रहा हूं। अच्छी कहानी वही होती है जो आपके ज़हन में कई कहानियां बनाने लगे। अकबर में ये क्षमता है। बहरहाल अब मैं उस प्रसंग को किताब से हू-ब-हू लिखता हूं।

“जब जवाब में ख़्वाजा मुअज़्ज़म ऊलजुलूल बकने लगे तो उन्हें लातों और घूंसो से चुप कराया गया। बाल से घसीट कर उन्हें नदी किनारे लाया गया और डुबा कर मारने की कोशिश की गई।“

क्या बादशाह सलामत ने भी लात-घूंसे चलाये होंगे या उनके लोग चला रहे होंगे और वे वहाँ खड़े होकर गालियां बक रहे होंगे! शाज़ी ज़मां लिखते हैं कि “अधम ख़ान और ख़्वाजा मुअज़्ज़म की मौत का ज़िक्र सुनकर बादशाह सलामत ने कहा कि हमने इससे बड़े-बड़े काम किये हैं। हैरत है कि लोग उसकी बात नहीं करते हैं। आप उनके बारे में जानते हैं लेकिन बोलते नहीं कि कुछ लोगों का दिल दुखेगा। “ अकबर के ये दो बड़े काम की झलकी आपने देखी। गुस्सा आने पर या इंसाफ़ के लिए वो ख़ुद सिनेमा के किसी नायक की तरह दुश्मन के मोहल्ले में घुस जाया करते थे। इतिहासकार और साहित्यकार दोनों मिलकर तय करेंगे कि अकबर के ये लक्षण बादशाहत की उस परंपरा में कहां से आ गए जहां मामूली से मामूली शब्दों में भी शाही तेवर हुआ करते थे। क्या गालियं भी शाही तहज़ीब का हिस्सा थीं ?

इतिहास का किरदार जब कोई साहित्य के सांचे में ढालता है तो वह लाई डिटेक्टर टेस्ट के लिए बिस्तर पर पड़े अपराधी की तरह बहुत कुछ बयां करने लगता है जिसे सबूतों से साबित करना मुश्किल हो जाता है। अकबर दुजानू बैठते थे। हम इसे वज्रासन कह सकते हैं मगर तस्वीरों में देखा कि वे पदमासन लगाकर बैठते थे। जैसा कि मैंने कहा कि यह किताब की सूचना भर है। समीक्षा नहीं। अकबर को तस्वीरें पसंद थीं। उपन्यास के आधे हिस्से का अकबर कैसा है वो मैं बता सकता हूं। अकबर भी शाज़ी ज़मां की तरह इतिहास का एक विद्यार्थी लगता है,जो झेलम पार कर भेरा में शाही लश्कर का पड़ाव डालता है और फ्लैश बैक में बाबर और हुमायूं के किस्सों को सुनता है। उस दौर के एक-एक पल को याद करने लगता है। यह उपन्यास भेरा में खेले जाने वाले शिकार की एक रात का साक्षात्कार है। कहानी का लावा वहीं फूटता है।

उस रात की कशिश और अकबर की बेचैनियों को समझना ज़रूरी है क्योंकि उसी रात के बाद की अगली सुबह से अकबर का किरदार मुकम्मल होता है। उपन्यास पहला खंड समाप्त होता है। अब मैं 189 पेज पढ़ चुका हूँ। उस रात की कैफ़ियत ने अकबर पर क्या ग़ज़ब ढाया,इस पर आगे लिखूँगा। बहरहाल,वारिस बनने के लिए ज़रूरी है कि आप विरासत जानें। उपन्यास के पहले हिस्से में बाबर, हुमायूं, अकबर साथ साथ चलते हैं। तैमूर, अफ़गान, उज़बेक, चंगेज़ के आपस की रंज़िशों और साज़िशों की दास्तां पढ़ते पढ़ते एक शब्द धीरे-धीरे जगह पाता दिखाई देता है। हिन्दुस्तानी। हुमायूं ईरान के शाह को हिन्दुस्तानी खाना खिलाता है। उनके नाम वही हैं जिन्हें हम आज भी मुग़लई कहते हैं। इस उपन्यास का हर पैरा किसी शानदार फिल्म में अचानक से आए दुर्लभ सीन की तरह सामने आता है। आप अकबर पढ़ सकते हैं।

नोट: चार जनवरी को शाम साढ़े छह बजे दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के मल्टीपरपस हॉल में इस किताब पर इतिहाकार मुकुल केशवन लेखक शाज़ी ज़मां से बात करने वाले हैं। सूत्रधार हैं संजीव कुमार। आप संजीव कुमार को ही सुनने जा सकते हैं। उम्मीदकरता हूं एक साहित्यकार या साहित्य का शिक्षक जब एक इतिहासकार के साथ इतिहास के एक नायक के साहित्यिकरण पर बात करेगा तो बातचीत उम्दा होगी।
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