कांख में अख़बार दबा लेने से जागरूकता नहीं आती

6 जनवरी, 2017,बिजनेस स्टैंडर्ड,पहली ख़बर। भारत के मुख्य सांख्यिकी कार्यालय का अनुमान है कि 2016-17 के लिए अनुमानित जीडीपी 7.6 प्रतिशत हासिल नहीं की जा सकेगी। इसकी जगह 7.1 प्रतिशत जीडीपी का ही लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा। नंवबर और दिसबंर के आंकड़े इस अनुमान में शामिल नहीं हैं। मुख्य सांख्यिकी अधिकारी टी सी ए अनंत ने कहा है कि नोटबंदी के असर का इसमें हिसाब नहीं लगाया गया है। इसका मतलब यह हुआ कि नोटबंदी से पहले भारत की अर्थव्यस्था की चाल धीमी पड़ती जा रही थी। इस गिरावट ने भी नोटबंदी के दौर में उद्योगों पर प्रहार किया होगा। जिसकी झलक 9 जनवरी के इंडियन एक्सप्रेस के नौकरियां जाने के आंकड़े में मिल सकती है। अखबार लिखता है कि अगर ये अनुमान सही साबित होते हैं जो बजट में सरकार के पास अपने मन का करने के लिए कम पैसे होंगे। बिजनेस स्टैंडर्ड ने याद दिलाया है कि दिसंबर में अपनी मौद्रिक नीति का एलान करते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक ने भी जीडीपी दर 7.6 प्रतिशत की जगह 7.5 प्रतिशत रहने का अनुमान बताया था।

सीएसओ साल में तीन बार जीडीपी का हिसाब लगाती है। इसे अडवांस एस्टिमेट, क्विक एस्टिमेट और एक्चुअल एस्टिमेट कहते हैं। आर्थिक पत्रकार अडवांस एस्टिमेट को बहुत भाव नहीं देते क्योंकि यह कच्चा अनुमान होता है। मई जून में जब क्विक एस्टिमेट आता है तो वो ज़्यादा सही होता है। सीएसओ ने इस बार एडवांस एस्टिमेट निकाला है। अब .5 प्रतिशत जीडीपी कितनी होती है, इसका नौकरियों पर कितना असर होता है, हम जैसे गैर आर्थिक पत्रकारों के लिए समझना मुश्किल है। thewire.in में एम के वेणु बताते हैं एक प्रतिशत पर एक लाख 45 हज़ार करोड़ का नुकसान होता है। इस हिसाब से आधा प्रतिशत कम होने पर 70-72 हज़ार करोड़ का नुकसान हुआ। जीडीपी की एक परिभाषा राष्ट्रीय आय होती है। इसका मतलब यह हुआ कि खपत घटी, नौकरी कम हुई। नोटबंदी के बाद से कई लोग जी डी पी में गिरावट को लेकर अलग अलग आशंकाएं जता रहे थे। आधी फीसदी से लेकर दो फीसदी की गिरावट की बात की जाती है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि इसका भारी नुकसान ग़रीबों को होता है जो एक दिन पैसा नहीं होने पर भारी तकलीफ झेलते हैं। ऐसे दिहाड़ी मज़दूर मारे जाते हैं।

बिजनेस स्टैंडर्ड ने जीडीपी गिरावट वाली ख़बर में लिखा है कि 2016-17 के दौरान मैन्यूफैक्चरिंग, खनन,बिजली में गिरावट दर्ज की जा रही है। सरकार कह रही है कि नोटबंदी के बाद भी राजस्व बढ़ा है। गिरावट के बीच राजस्व कैसे बढ़ रहा है? दोनों में से कोई एक बात सही हो सकती है। अब इकोनोमिक टाइम्स की दो ख़बरों का विश्लेषण ध्यान से पढ़िये। बिजनेस स्टैंडर्ड में अर्थव्यवस्था धीमी है तो इकोनोमिक टाइम्स में उछल कूद कर रही है।

9 जनवरी, 2017, इकोनोमिक टाइम्स। पहले पन्ने की ख़बर। नोटबंदी के चालीस दिनों में दो करोड़ नए खाते खोले गए। ख़बर पढ़ते हुए सवाल कर सकते हैं कि जब बैंकों के दरवाज़े तो बंद थे,लाइने लगी थीं तब भी दो करोड़ खाते खुले हैं,इसका मतलब है कि बैंकों ने वाकई कमाल का काम किया होगा। अख़बार कहता है कि ये नोटबंकी का ज़बरदस्त असर है। अखबार ने फाइनेंनशियल डेटा यूनिट(FIU) के आंकड़ों के आधार पर लिखा है कि 2.10 करोड़ नए खाते खोलकर 3 करोड़ रुपये जमा किये गए हैं। इनमें पचास हज़ार करोड नगद जमा हुए हैं और तीन लाख करोड़ चेक या ड्राफ्ट वगैरह से। अगर तीन लाख करोड़ काला धन होता तो कोई चेक या ड्राफ्ट से क्यों जमा करता। सरकार ने जब नगदी रखने के सारे रास्ते बंद कर दिये तो खातों में पैसा आना ही था। ज़रूर यह सरकार के उन एक इरादों की बड़ी कामयाबी है कि पैसा आधाकारिक सिस्टम में आया है अब इसका हिसाब लगाया जा सकेगा लेकिन यह पैसा काला धन तो नहीं है। नोटबंदी के मुख्य उद्देश्यों में काला धन की समाप्ति की बात थी।

वित्त मंत्री भी कह रहे हैं कि बैंकों में आ जाने से ही पैसा सफेद नहीं हो जाता है। सरकार ने आलोचना के दिनों में छापे मारकर और नोटिस भेज कर छवि बटोरी कि खातों की जांच हो रही है। इतनी कवायद के बाद भी यह आंकड़ा 4 हज़ार करोड़ के आसपास ही बैठता है। वो भी कानूनन साबित होने में वक्त लगेगा मगर अब आप ध्यान देंगे कि यह नहीं कहा जा रहा है कि जनधन की जांच हो रही है। इतना पकड़ा गया है। जबकि उस वक्त जनधन को लेकर खूब निशाना साधा गया। अब जनधन की कोई रिपोर्टिंग हो रही हो, मुझे नहीं मालूम। सारे अख़बार पढ़ने का दावा तो नहीं कर सकता।
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9 जनवरी,2017,इकोनोमिक टाइम्स,पेज नंबर-15, हेडलाइन में कहा गया है कि नोटबंदी के दौरान राज्यों की वैट वसूली काफी बढ़ गई। अखबार ख़बर बताने से पहले ही दूसरे पैराग्राफ में निष्कर्ष बता देता है कि इससे वो बात ग़लत लगती है कि नोटबंदी के कारण नगदी की कमी से मांग में कमी आई थी।

तीसरे पैराग्राफ में ख़बर है कि ज़्यादातर राज्यों ने देखा कि सेल्स टैक्स की वसूली में बढ़ोत्तरी हुई है। अब राज्यों के नाम देखिये अखबार क्या लिखता है। यहीं से शुरू होता है बिजनेस ख़बरों का खेल।

नागालैंड, मेघालय, जम्मू कश्मीर में क्रमश: 133 फीसदी, 84 फीसदी और 82 फीसदी की बढ़ोतरी होती है। इसके बाद चौथे पैराग्राफ में सीधे कहा जाता है कि नवंबर में 23 राज्यों का संयुक्त वैट संग्रह 18.1 प्रतिशत से बढ़ा है। जिससे पता चलता है कि बिक्री काफी हुई है। खपत बढ़ी है। दिसंबर के बाद 17 राज्यों ने जो आंकड़े दिये हैं,उनके अनुसार बिक्री में 8.9 प्रतिशत वृद्धि हुई है। ख़बर एलान करती है कि यह आंकड़े केंद्र सरकार के दावे को मज़बूत करते हैं कि नोटबंदी का राजस्व वसूली पर सकारात्मक असर पड़ा है।

एक सामान्य पाठक की तरह सोचिये। एक तो यह पर्याप्त आंकड़े नहीं हैं। ख़बर को बड़ा बनाने के लिए छोटे राज्यों में सेल्स बढ़ने के आंकड़ों का सहारा लिया गया है। प्रतिशत तो बता दिया गया है मगर यह नहीं बताया गया कि किस चीज़ की बिक्री बढ़ी है। क्या यह उछाल सिर्फ पेट्रोल डीज़ल की बिक्री से आया है क्योंकि नोटबंदी के दौरान पुराने नोटों से पेट्रोल पंपों को अलग रखा गया था। अखबार ने क्यों नहीं बताया कि नोटबंदी के दौरान पेट्रोल डीज़ल की बिक्री में पिछले महीनों की तुलना में कितनी वृद्धि हुई है। उससे राज्यों को सेल्स टैक्स कितना मिला है या जो भी टैक्स होता है वो कितना मिला है। क्या आपने ऐसी कोई ख़बर देखी है? प्लीज़ अपने कमेंट में उसका ज़िक्र ज़रूर कीजिएगा।

अख़बार पांचवें पैराग्राफ के ख़त्म होने तक बड़े राज्यों के बारे में कुछ नहीं कहता है लेकिन छठे पैराग्राफ में अचानक घोषणा करता है कि बड़े राज्यों में केवल बंगाल में वैट की वसूली में 7.84 प्रतिशत की कमी आई है। यहां तक आपको यह अखबार नहीं बताता कि महाराष्ट्र, यूपी, बिहार या दिल्ली में वैट की वसूली पर क्या असर पड़ा है। क्या आप इस ख़बर की बाज़ीगरी को समझ पा रहे? यह देश का सबसे बड़ा आर्थिक अख़बार है।

अब सातवें पैराग्राफ में रिपोर्टर कहती हैं कि कहता अर्थशास्त्री इस डेटा के आधार पर निश्चित निर्णय देने को लेकर सतर्क हैं।अब यहां खेल देखिये। इसी पैराग्राफ की अगली लाइन में कोई अर्थशास्त्री हैं वो असली बात कह देते हैं कि हो सकता है कि पेट्रोल और डीज़ल की बिक्री बढ़ने से वैट में वसूली हुई है क्योंकि बैंकों के अलावा पुराने नोटों को खपाने का यही एक खुला अड्डा था। एक अर्थशास्त्री डी के जोशी कहते हैं कि पुराने नोटों से छुटकारा पाने के लिए हो सकता है कि व्यापारियों ने ज्यादा टैक्स जमा करा दिये हों। क्या व्यापारी अपनी तरफ से बिना बिक्री का कागज़ दिखाये कुछ भी वैट जमा करा सकते हैं? क्या वैट अधिकारी बिना उन कागज़ों के मूल्यांकन के ही वैट जमा करा लेगा?

पाठकों और दर्शकों,क्या अखबार इस बारे में आपको बता रहा है? रिपोर्टर अपनी तरफ से क्यों नहीं कहती है कि पेट्रोल डीज़ल के कारण वैट की वसूली बढ़ी है? उसने अपने सोर्स के बारे में क्यों नहीं बताया कि कहां से वैट वसूली के आंकड़े मिले? मिले तो किस चीज़ की वैट वसूली बढ़ी है इस सवाल का क्या हुआ? जहां से भी ये आँकड़े मिले होंगे वहां से यह क्यों नहीं पता चला कि किस सेक्टर में वैट वसूली कम हुई है और किस सेक्टर में बढ़ी है। क्या वैट की वसूली के आंकड़ें राह चलते मिल जाते हैं?

यहां तक इस खबर के आठ पैराग्राफ समाप्त होते हैं। नौवें पैराग्राफ में अख़बार लिखता है कि कई राज्यों में दिसंबर मे टैक्स वसूली अक्तूबर की तुलना में बढ़ती रही मगर नवंबर की तुलना में कम हुई। इस लाइन को दो बार पढ़िये।आपको करतबबाज़ी समझ आएगी।नौवें पैराग्राफ में लिखा मिलता है कि महाराष्ट्र,तमिलनाडू जिन्हें मैन्यूफैक्चरिंग स्टेट कहा जाता है,वहां नवंबर दिसंबर में वैट की वसूली बढ़ी है। क्या तमिलनाडू ने अपनी तरफ से ऐसा एलान किया है?

दसवें पैराग्राफ में फिर आंकड़े आते हैं। महाराष्ट्र में अक्तूबर में वैट की वसूली 4.74 प्रतिशत थी। नवंबर में 25.99 प्रतिशत बढ़ गई है और दिसंबर में घटी मगर अक्तूबर की तुलना में 16.73 प्रतिशत बढ़ी। महाराष्ट्र की वैट वसूली अक्तूबर में 4.74 प्रतिशत
थी तो इसका मतलब केंद्रीय सांख्यिकी अधिकारी टी सी ए अनंत का आंकड़ा सही है कि अक्तूबर महीने में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में गिरावट दर्ज की जा रही थी तभी तो अक्तूबर में वहां वैट वसूली बढ़ी है। क्या भारत सरकार की किसी अन्य संस्था ने ऐसा कोई आंकड़ा दिया है कि महाराष्ट्र में नवंबर और दिसंबर में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में उछाल आया है?

तमिलनाडू भी तो मैन्यूफैक्चरिंग स्टेट है। अक्तूबर में वहां भी वैट वसूली 5.96प्रतिशत थी। महाराष्ट्र से ज़्यादा मगर बहुत ज़्यादा नहीं। लेकिन नवंबर और दिसंबर में इस राज्य में वैट वसूली 9.72 फीसदी और 11 प्रतिशत बढ़ती है। इन आंकड़ों को ग़ौर से देखिये। दोनों ही मैन्यूफैक्चरिंग और औद्योगिक राज्य माने जाते हैं। अक्तूबर में दोनों की वैट वसूली आस पास रहती है लेकिन नवंबर दिसंबर में महाराष्ट्र में तमिलनाडू की तुलना में काफी उछाल आता है। क्या सारे उपभोक्ता तमिलनाडू छोड़कर महाराष्ट्र चले गए थे ? गूगल करने पर पता चला कि सितंबर से महाराष्ट्र ने वैट की दरों में वृद्धि की थी। क्या इसका असर रहा होगा महाराष्ट्र की वसूली में ? रिपोर्टर को शायद पता नहीं होगा।

अब देखिये बारहवें पैराग्राफ में इकोनोमिक टाइम्स क्या लिख रहा है। लिखता है कि अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा में नवंबर माह में वैट वसूली में गिरावट आई है। वैट का डेटा सप्लाई करने वाले किसी ने इन्हें ये नहीं बताया कि कितनी फीसदी गिरावट हुई है। अक्तूबर की तुलना में अक्तूबर के मुकाबले केरल और बंगाल ने लोअर ग्रोथ दर्ज की है। कितने हिन्दी के पाठक इस लाइन का मतलब समझते हैं। अक्तूबर के मुकाबले नवंबर में लोअर ग्रोथ का क्या मतलब हुआ है। क्या इसकी जगह रिपोर्टर डिक्लाइन लिख सकती थी? केरल और बंगाल में अक्तूबर के मुकाबले वैट की वसूली कम हुई है इसे सीधा सीधा क्यों नहीं कहा जा सकता है।

ग्यारहवें पैराग्राफ में अखबार और कांड करता है। लिखता है कि दिसंबर माह में मेघालय में वैट वसूली में 66.41 फीसदी की गिरावट आती है। यही अखबार इसी खबर के तीसरे पैराग्राफ में लिखता है कि मेघालय मेंसेल्स टैक्स कलेक्शन में 84 फीसदी की वृद्धि हुई है। ग्यारवहें पैराग्राफ तक आते आते 66.41 प्रतिशत की गिरावट आ जाती है। नींद में यह ख़बर लिखी गई है क्या। आखिरी लाइन यूपी के बारे में नवंबर में वैट कलेक्शन 16 फीसदी बढ़ा और दिसंबर में 6.9 प्रतिशत। क्यों ?

इस ख़बर के साथ ग्राफिक्स को भी ध्यान से देखना होगा। बिहार का नवंबर में टैक्स कलेक्शन 15.1 प्रतिशत बढ़ता है लेकिन दिसंबर में गिर कर 5.1 प्रतिशत हो जाता है। ये गिरावट क्यों हुई? कोई जवाब नहीं। मध्य प्रदेश में नवंबर में वैट कलेक्शन 31.8 फीसदी बढ़ता है लेकिन दिसंबर में गिरकर 12.7 फीसदी आता है। नवंबर की तुलना में दिसंबर में इतनी तेज़ गिरावट होती है फिर भी इस पर रिपोर्टर और एडिटर का ध्यान नहीं गया। इतनी तेज़ उछाल और गिरावट का संबंध पेट्रोल पंपों पर पुराने नोटों की आवाजाही है या उत्पादन और उपभोग में बढ़त और गिरावट है। इसका कोई ज़िक्र इस रिपोर्ट में नहीं मिलता है। इस रिपोर्ट का एक ही मकसद है ये हेडलाइन। “STATES RECORD JUMP IN VAT COLLECTIONS AFTER NOTE BAN”

ग्राफिक्स में सबसे नीचे दो खाने बने हैं। एक का शीर्षक है आर्ग्यूमेंट और दूसरे का शीर्षक है काउंटर आर्ग्यूमेंट। पूरी ख़बर को दोबारा पढ़ गया लेकिन पता ही नहीं चला कि आर्ग्यूमेंट किसका था। ख़बर में वैट के आंकड़ों का सोर्स तो था नहीं। सूत्रों के हवाले से भी किसी का दावा नहीं था तो काउंटर आर्ग्यूमेंट कहां से आ गया। क्या रिपोर्टर अपने आर्ग्यूमेंट का काउंटर आर्ग्यूमेंट खोज रही थी? ख़बर के भीतर इन आँकड़ों के आधार पर सरकार ने तो कोई बयान नहीं दिया है।

सबको पता है कि बारीक नज़र से ख़बरें पढ़ने का वक्त किसी के पास नहीं है। पाठक हेडलाइन देखेंगे और खुश हो जाएंगे। ट्वीटर पर इस ख़बर को री ट्वीट कर देंगे। आंकड़ों और इन्हें पेश करने के वाक्यों की बाज़ीगरी पकड़ने में एमबीए डिग्री वाले को भी कई साल लग जायेंगे। आप और हम तो एक सामान्य पाठक हैं। तीन बार पढ़ जाते हैं तब भी ख़बर समझ नहीं आती है।हो सकता है मैने इस ख़बर की ग़लत व्याख्या की हो,अगर किसी को लगता है तो बताये। सीखने को मिलेगा।

पाठक होना आसान नहीं है। अख़बार ख़रीद लेने से आप पाठक नहीं हो जाते हैं। टीवी देखने से आप दर्शक नहीं हो जाते हैं। नोटबंदी के दौरान हम चैनल वाले इसलिए एक्सपोज़ हो गए क्योंकि हमें बिजनेस रिपोर्टिंग आती नहीं। अब पता चल रहा है कि बिजनेस अख़बारों को पढ़ने के लिए भी विशेष कौशल चाहिए। बिजनेस रिपोर्टर अक्सर सख़्त समीक्षा से बच जाते हैं क्योंकि उनका चेहरा नहीं होता है। नाम होता है मगर बारीक फोंट में होता है। पाठक भी चालबाज़ियों को पकड़ने में सक्षम नहीं है।

आप खुद कहते हैं कि मीडिया क्रांति का दौर है। पचासों माध्यम से ख़बर आ जाती है। अरे भाई, माध्यम बढ़ गए हैं। क्या ख़बरों की विश्वसनीयता भी बढ़ी है? जितने माध्यम बढ़े हैं उसी अनुपात में न्यूज़ रूम में मानव संसाधन अर्थात काबिल पत्रकारों की संख्या में गिरावट आई है। आप ख़बर से ज़्यादा स्टार एंकर का चेहरा और उसकी उछल कूद देखते हैं। माथे पर गोबर लेप लिया है तो हम क्या कर सकते हैं। आज ही कस्बा पर दो लेख लिखने के लिए नौ बजे से लेकर ढाई बजे तक तीन अखबारों की चार ख़बरों को बार बार बांचा तब जाकर मन में कुछ सवाल पैदा हुए। आप समझते हैं कि कांख में इकोनोमिक टाइम्स या दैनिक जागरण दबा लेने से आप भांति भांति के जागरूक हो गए। जागरूक नागरिक। जागरूक मतदाता। जागरूक पाठ।

आप पाठक ख़ुद से पूछिये कि जब पढ़ने के नाम पर आपको पढ़ना नहीं आता है या आपसे कोई चालबाजी कर जाता है क्योंकि आपके पास समय नहीं है तब आम जनता के साथ कितना धोखा होता होगा। किसके पास एक से अधिक माध्यमों की ख़बर पढ़न और उसके लिए पैसे देने की क्षमता है। बहुत कम लोग हैं। कम समय के कारण पाठक हेडलाइन देखकर ही राय बना लेते हैं। मैं भी इस तरह से नहीं पढ़ता था। नोटबंदी के बाद कोशिश कर रहा हूं कि पाठक बनूं। पत्रकारिता का स्तर राजनीति से भी गया गुज़रा है। सोचिये हम जैसे पत्रकार इन्हीं अख़बारों की खबरों और लेखों को उठाकर आप तक पहुंचा देते हैं। यह समझते हुए कि इनके पास संसाधन हैं। पुराने रिपोर्टर हैं। सही ही लिखा होगा। जब हम लोग धोखा खा जाते हैं तो आप पाठकों की क्या औकात है। करते रहिए फलां मोदी ज़िंदाबाद फलां मोदी मुर्दाबाद। क्या पढ़ने का इतना ही मकसद है? तो फिर पढ़ना बंद कर दीजिये।