आइये ओबामा जी

अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत के मेहमान होंगे। इस ख़बर को कूटनीति की भाषा में गेम चेंजर, मास्टर स्ट्रोक, सिक्सर जैसी शब्दावलियों से नवाज़ा जा रहा है। कई लोग लिख रहे हैं कि प्रधानमंत्री ने क्या छक्का मारा है । जैसी ही यह ख़बर आई सोशल मीडिया पर उत्साह की लहर दौड़ गई। इस खबर को ऐसे पेश भी किया गया जैसे कोई बड़ी कामयाबी हाथ लगी है।  एक बड़ी कामयाबी तो है ही। मैं कूटनीति का जानकार नहीं हूं बस इस ख़बर को लेकर गूगल में गोते लगाने लगा। ओबामा और भारत के संबंध में हज़ारों पन्ने खुलने लगे। मेरी दिलचस्पी ओबामा के पहले भारत दौरे  में थी । देख रहा था कि तब  किस भाषा में भारत अमरीका संबंधों में क्रांतिकारी बदलाव की घोषणा की गई थी। नवंबर 2010 में ओबामा भारत आए थे। तब भी लोगों ने भारत अमरीका संबंधों में युगान्तकारी बदलाव का एलान किया था, वो बदलाव पूरे हुए या नहीं मुझे नहीं मालूम। प्रधानमंत्री जब अमरीका गए तब भी दोनों के संबंधों में युगान्तकारी बदलाव की बात कही गई। उनसे पूर्व मनमोहन सिंह अमरीका जाते थे तो युगान्तकारी बदलाव कर आते थे। ठीक इसी तरह का आशावाद इस बार भी नज़र आ रहा है। हम इतने युगान्तकारी बदलावों के बाद कहां पहुंचे इसका हिसाब दिये बग़ैर इसे गेम चेंजर यानी खेल के नियम बदलने वाला बताया जाने लगा है।  कई बार आपको संबंधों का नवीनीकरण करना पड़ता है जैसे आप ड्राईविंग लाइसेंस का करते हैं। सरकार के स्तर पर यह काम अलग अलग नेतृत्व के दौर में होते रहता है।

इतना ज़रूर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी काम को इस तरह से पेश करते हैं जैसे उसमें सीधे उन्हीं की दिलचस्पी हो। योजना हो या विदेश यात्रा या कूटनीति। अभियानों का नाम भले ही कुछ और हो लेकिन प्रचार और प्रभाव से वे साफ कर देते हैं कि ये नरेंद्र मोदी योजना है। ऐसा पहले भी कई नेता कर चुके हैं और जो नहीं कर सकते हैं या नहीं कर पाये उन्हें नरेंद्र मोदी की इस शैली को देखकर नाखून चबाने का मन करता ही होगा। 26 जनवरी के दिन ओबामा मेहमान होंगे इसे प्रधानमंत्री ने इस तरह से ब्रेक किया जैसे कोई राजनीतिक संपादक किसी बड़ी राजनीतिक घटना को। एकदम न्यूज़ चैनलों पर होने वाली ब्रेकिंग न्यूज़ की शैली में। उनके ख़बर ब्रेक करते ही सारे ब्रेक करने लगे। सबने कहा ये कूटनीतिक छक्का है। गेंद बाउंड्री लाइन के बाहर जा गिरी है। अब किसे याद है कि इसी साल 26 जनवरी को जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे भारत के मेहमान थे। गूगलागमन से पता चला कि यूपीए सरकार ने इसे एक ठंडे आयोजन की तरह पेश किया। जनवरी के पहले हफ्ते में इस ख़बर को ऐसे पेश किया गया जैसे आंबे हों या ओबामा क्या फर्क पड़ता है। गूगल में कोई उत्साहवर्धक चर्चा के प्रमाण नहीं मिलते हैं। ट्वीटर और फेसबुक पर उत्साह पैदा हुआ हो इसके कम ही प्रमाण मिलते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मेहमान की खबर को तीन महीने पहले ब्रेक किया है। वे लगातार धारणाएं बनाते हैं। कुछ दिनों के अंतराल पर ऐसे कुछ करते हैं कि उनकी बनाई हुई धारणाओं का वृत्त यानी सर्किल और बड़ा हो जाता है। मुझे आज की राजनीति में दिन भर हर छोटी बड़ी धारणाओं से लड़ने वाला नरेंद्र मोदी की तरह सक्रिय कोई दूसरा  नज़र नहीं आता है। शिंजो आबे की यात्रा भी बड़ी कूटनीतिक कामयाबी थी लेकिन तबकी सरकार और प्रधानमत्री ने इस यात्रा को प्रचार की तरह इस्तमाल नहीं किया। पिछली सरकार कूटनीति का काम बंद कमरों में करती थी और बाकी का काम कुछ चुनिंदा बुजुर्ग विशेषज्ञों के विश्लेषण पर छोड़ देती थी। नरेंद्र मोदी इस काम को स्वयं जनता के बीच ले जाते हैं। ऐसे पेश करते हैं जैसे सरकार कितनी सक्रिय है।

इस साल शिंजो आबे के आने के पहले जापान के सम्राट का भारत दौरा हुआ था। शिंजो आबे की तीन दिन की यात्रा को भी भारत जापान संबंधों में नई शुरूआत के रूप में देखा गया। लेकिन यह यात्रा संपादकीय पन्नों की जागरुकता तक ही सीमित रही। आबे के बारे में भारत के लोगों ने ठीक से तब जाना जब प्रधानमंत्री जापान गए।  शिंजे की पहली भारत यात्रा बिना नोटिस के चली गई लेकिन मोदी ने अपनी पहली जापान यात्रा को कई तरह के विमर्श में बदल दिया। जापानी में ट्वीट कर दिया, जापान के प्रधानमंत्री ने उन्हें ट्वीटर पर फोलो किया. दोनों नेताओं के व्यक्तिगत संबंधों का बखान होने लगा, मोदी ने शिंजो आबे को बियर हग किया यानी अपनी खुली बांहों में भर लिया। नीरस कूटनीति को रियालिटी शो में बदलने से टी आर पी तो आ ही जाती है। मोदी को अगर कोई न्यूज़ चैनल दे दिया जाए तो वे पहले ही दिन उसे नंबर वन बना देंगे। शिजे आबे की यात्रा पर आर्चिस मोहन का एक लेख मिला। इस विषय पर सारे लेख मैंने नहीं पढ़े। इस लेख में बताया गया है कि गणतंत्र दिवस के मौके पर पहली बार कोई जापानी प्रधानमंत्री शिरकत करेगा। एशिया के नंबर दो और नंबर तीन के बीच सहयोग का ऐसा नज़ारा पहले कभी नहीं देखा गया। व्यापार,टेक्नालजी,ऊर्जा, रक्षा के क्षेत्र में सहयोग की भविष्यवाणियां हुई। इन सहयोगों के कारण भारत की आर्थिक स्थिति आज कहां पहुंची है मैं नहीं बता सकता लेकिन तब इन सहयोगों को महानत बताया गया था। तब आबे ने कहा था कि मज़बूत भारत जापान के हित में है। इस कड़ी में मनमोहन सिंह की 2012 मे हुई जापान यात्रा को भी महत्वपूर्ण बताया गया। हाल ही में खबर आई कि जापान मंदी की चपेट में चला गया है तो किसी ने नहीं लिखा कि इस संकट का मोदी और आबे के बीच हुए करार पर क्या असर पड़ेगा।

2007 में भारतीय संसद को संबोधित करने वाले  शिंजो आबे को जापान के पहले प्रधानमंत्री होने का गौरव मिला।  तब आबे ने कहा था कि भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने आबे के नाना की मेज़बानी की थी। 1957 में आबे के नाना नोबुसुके किशी जापान के प्रधानमंत्री के तौर पर भारत आए थे। मोदी सिर्फ राष्ट्रीय परिवारवाद के ख़िलाफ़ हैं, अंतर्राष्ट्रीय परिवारवाद के नहीं। सबने मोदी और आबे को एक सोच और एक दूसरे को पहले से जानने वाला बताया। पर्सनल केमेस्ट्री। लेकिन किसी ने नहीं लिखा कि आबे का ख़ानदान तो नेहरू को इस बात के लिए नेहरू का कर्ज़दार है कि दूसरे विश्वयुद्द के बाद नेहरू पहले प्रधानंमत्री थे जिन्होंने आबे के नाना का सार्वजनिक स्वागत किया। जापान और भारत के संबंधों के बीच नया मोड़ तो तब भी आया होगा। कूटनीति में ये मोड़ वीडियो गेम्स की तरह है। टेंपल रन की तरह। आते जाते रहते हैं।

अपनी पहली यात्रा में जापान ने भारत को मार्च 2013 तक 40 अरब डालर की मदद का वादा किया था। इस मदद का कोई सार्वजनिक हिसाब किताब तो होता नहीं है। सात जनवरी 2014 के दिन लाइव मिंट अखबार में एक लेख छपा मिला। जिसमें जापान के प्रधानमंत्री की यात्रा को ‘एपिक सिग्नल’ बताया गया है । आबे की सरकार के सहयोगी दल के नेता का यह बयान था। सी उदय भास्कर ने कहा था कि यह कोई ‘कैज़ुअल चयन’ नहीं है। 2012 से आबे के प्रधानमंत्री बनने के बाद जापान भारत संबंधों में काफी सुधार हुआ है। भारत दस सालों से जापान के सम्राट को आमंत्रित कर रहा था लेकिन वे नवंबर 2013 में आ सके। हमारे संबंध अब बेहतर होने लगे हैं। इन विश्लेषणों के अलावा आबे की भारत यात्रा को लेकर पब्लिक में तो खास उत्साह नहीं था न ही सरकार ने उत्साह पैदा करने का कोई प्रयास किया था।

मैं कूटनीतिक क्रियाकलापों के महत्व को कम नहीं कर रहा। लेकिन इन यात्राओं के उत्साह पर संदेह होने लगता है।  जिस तरह से इन यात्राओं को इतिहास और भविष्य की उपमाओं से लैस किया जाता है, उस तरह से इनके मूल्याकंन का कोई ठोस पैमाना तो होना ही चाहिए।  समझ नहीं आता कि इन भविष्यवाणियों का जनजीवन पर किस तरह का असर पड़ा। पड़ता तो है मगर कूटनीति के जानकार इस तरह के असर को कभी अपने मूल्यांकन में शामिल नहीं करते हैं। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आ रहे हैं। वे भारत आ चुके हैं। ओबामा के आगमन पर कूटनीतिक तीर मार लेने की दंतकथाएं रची जा रही हैं जैसे ओबामा की पहली भारत यात्रा और मनमोहन सिंह की अमरीका यात्रा के वक्त रचे गए थे। जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमरीका यात्रा के समय रचे गए।

गूगल में ऐसी ख़बर मिली कि बराक ओबामा ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सम्मान में सबसे महंगा भोज दिया था। 2009 से उन्होंने पांच ऐसे भोज के आयोजन पर कोई साढ़े नौ करोड़ रुपये खर्च किये थे जिसमें से सबसे महंगा भारतीय प्रधानमंत्री के सम्मान में दिया गया भोज था। साढ़े तीन करोड़ रुपये का भोज। चीन के राष्ट्रपति के सम्मान में दिये गए भोज पर ओबामा ने 2.4 करोड़ रुपये ही खर्च किये थे। इतना महंगा खाना ये पढ़कर कूटनीतिक कामयाबी पर गर्व करने वालों का सर शर्म से झुक जाना चाहिए। इससे हासिल क्या होता है। क्या कोई संबंध पूरा हो जाता है। तब भी कहा गया होगा कि युगांतकारी संबंध कायम हो गया है। वो कहां बिला गया जो अब कहा जा रहा है कि युगांतकारी संबंध कायम होने जा रहा है। इसी तरह जब ओबामा 2010 में भारत आए थे तब गार्जीयन अखबार ने लिखा था कि 40 विमान लेकर आए थे। कई करोड़ रुपये उनकी भारत यात्रा पर अमरीका के ही खर्च हो गए थे। भारत के तो हुए ही होंगे। ये सब खर्चे नैतिकता की कसौटी पर नहीं कसे जा सकते लेकिन यह समझना चाहिए कि इन यात्राओं से जो नज़ारा रचा जाता है वो जनता के पैसे से होता है। तो एक दिन जनता को बताना चाहिए कि नतीजा क्या निकला। सिर्फ उसी दिन नहीं बल्कि पांच या छह साल बाद उसकी पब्लिक आडिट होनी चाहिए।

ज़ाहिर है अब सरकार बदली है तो भारत अमरीकी संबंधों को ओबामा मोदी युग्म में व्याख्यायित किया जाएगा। मई में जब मनमहोन सिंह प्रधानमंत्री के दफ्तर से विदा हुए तो ओबामा ने अपने संदेश में कहा था कि मैं हर दिन आपके साथ करने को मिस करूंगा। फोन कर कहा कि आपका कार्यकाल भारत अमरीका संबंधों के लिए बहुत अच्छा रहा है। सार्वजनिक जीवन में ऐसे बहुत कम लोग हैं जिन्हें मैं इतना चाहता हूं और जिनकी इतनी प्रशंसा करता हूं। मनमोहन सिंह ने जवाब में कहा कि ओबामा के बिना भारत अमरीका संबंध इतना बेहतर नहीं हो सकता था। 2013 में जब मनमोहन सिंह अमरीका के दौरे पर थे तो एक खबर ये छपी मिली कि राष्ट्रपति ओबामा उन्हें छोड़ने के लिए व्हाईट हाउस के पोर्टिको तक आए। अमरीकी राष्ट्रपति ऐसा बहुत ही कम करते हैं। जो लोग व्हाईट हाउस के प्रोटोकोल के बारे में जानते हैं उन्हें पता होगा कि ऐसा हाल के दिनों में किसी के साथ नहीं देखा गया होगा। ओबामा मनमोहन सिंह को एक महान नेता और अर्थशास्त्री के तौर पर सम्मान किया करते थे। ऐसी ही ख़बर वाजपेयी की किसी यात्रा के समय लिखी गई होगी।

ध्यान रखना चाहिए कि विदेश संबंध ऐसी ही यात्राओं की निरंतरता से ठंडे गरम होते रहते हैं। ओबामा ने नवंबर 2009 में मनमोहन सिंह की यात्रा पर जो राजकीय भोज दिया था वो राष्ट्रपति बनने के बाद पहला था। यही मनमोहन सिंह ने जब राष्ट्रपति बुश के बारे में कहा था कि राष्ट्रपति जी भारत में लोग आपको बहुत याद करते हैं तो खूब हंसी भी उड़ाई गई थी। बुश को कौन यहां प्यार करता है। लेकिन लोग भूल गए कि बुश का मतलब अमरीका का राष्ट्रपति भी था। इसमें कोई शक नहीं कि भारत अमरीका होना चाहता है। बहुत कुछ वैसा हो चुका है। अमरीका भारतीयों के ख्वाब में तो आता ही है। ओबामा के भारत दौरे पर राष्ट्रपति भवन में एक भोज रखा गया ता। ओबामा ने मनमोहन सिंह के बारे में कहा था कि उनका जीवन सत्य के सिद्धांतों, करुणा और प्रेम पर आधारित है। कुछ ही सालों बाद भारत की जनता ने मनमोहन सिंह को सबसे भ्रष्ट सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर देखा और पब्लिक मनमोहन सिंह को देखकर इस कदर गुस्से में आ गई कि कांग्रेस को पचास सीटें भी नहीं मिलीं।

लेकिन राष्ट्र प्रमुखों के बयानों में संबंध चासनी में डूबे नज़र आते हैं। सब कुछ मीठा मीठा और महान ही नज़र आता है। दोबारा चुने जाने पर मनमोहन सिंह ने ओबामा को फोन किया था कि फिर से भारत आइये। अब इतने साल बाद ओबामा भारत आ रहे हैं तो वही सब बखान होने लगा है। होना भी चाहिए। इसमें कुछ गलत नहीं है। बस ये है कि क्या हम इन यात्राओं को वास्तविक धरातल पर रखकर देख पाते हैं। भारत में अभी गणतंत्र दिवस के मौके पर ओबामा के आगमन पर जश्न मन ही रहा था कि ओबामा ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को फोन कर दिया कि वाशिंगटन इस्लामाबाद से अपने संबंधों को महत्व देता है। भारत यात्रा के एलान के कुछ ही घंटों बाद ओबामा ने फोन किया जैसे चिन्ता मत करो, बस जाने के लिए जा रहे हैं। तुम तो मेरे पार्टनर हो ही। चूंकि अमरीका को सब मुखिया मानते हैं इसलिए ओबामा ने फोन कर दिया ताकि पाकिस्तान को न लगे कि भारत जाकर ओबामा जी उन्हें चिढ़ा रहे हैं। सीमा पार दिल न जले।

दिलजले तो भारत में भी कम नहीं होंगे। जापान के प्रधानमंत्री की यात्रा के संबंध में छपी ख़बर पर किसी ने टाइम्स आफ इंडिया की साइट पर कमेंट किया है कि मैंने 40-45 देशों के ऐसे समारोहों का अध्ययन किया है कोई भी देश किसी विदेशी राष्ट्र प्रमुख को मेहमान के तौर पर नहीं बुलाता है। मेरे ख़्याल से यह नज़रिया ठीक नहीं है। राष्ट्रपति ओबामा की लोकप्रियता गिरती जा रही है ऐसे में वो मोदी टानिक लेने भारत आ रहे हैं तो थोड़ा खुश होना चाहिए। बस ये न लगे कि ओबामा पहली बार आ रहे हैं। राजनय संबंध निरंतरता में चलते हैं, हर कोई अपने हिस्से की ईंट जोड़ते चलता है। प्रधानमंत्री मोदी का वहां जाना क्या कम था जो ओबामा का यहां आना उससे बेहतर हो गया। ठीक से प्रधानमंत्री की पहली अमरीका यात्रा के तीन महीने भी नहीं हुए हैं। ऐसा क्या बच गया उस यात्रा में जो इस बार पूरा होगा। धीरे धीर खबरें आएंगी। बहरहाल निगेटिव होने की ज़रूरत नहीं है। ओबामा आ रहे हैं तो जस्ट चिल्ल। मजमा लगते रहना चाहिए।