हार्न प्रिय बिहार

क्या कोई है जो बिहार को बिना हार्न के रहना सीखा सकता है। कोई है जो बुद्ध के इस विहार में गाड़ियां बिना हार्न विचरण करने लगें। वैसे तो इस मामले में पूरे भारत का रिकार्ड ख़राब है लेकिन बिहार तो लगता है जैसे हार्न बजाने को उत्सव में बदल चुका है। यहां की सड़कों पर चलिये तो लोग इस कदर हार्न बजाते मिल जायेंगे जैसे किसी म्यूज़िक क्लास से लौट रहे हों। एक हद तक झुंझलाहट जब शिथिल पड़ने लगी तो मैं पटना की सड़कों पर करतल ध्वनि कतरी गाड़ियों की आवाज़ में संगीत सुनने लगा। काश कि मैं किसी ह्वेनसांग की तरह लिख पाता कि जब मैं साल 2014 के जुलाई मास में पटना शहर में भ्रमण कर रहा था तब देखा कि पटना दुनिया का अकेला शहर है जहां के लोगों ने हार्न बजाने की कला को नागर-कला यानी किसी अर्बन आर्ट में बदल दिया है। आश्चर्य की बात है कि दुनिया भर में अपनी कला का लोहा मनवाने वाले सुबोध गुप्ता जैसे कलाकारों की भी नज़र बिहार के इस हार्न-कला पर नहीं पड़ी है। उम्मीद है कि सौ साल बाद जब कोई विद्वान पटना का अध्ययन कर रहा होगा तब वो इस शहर को हार्न-हेरिटेज सिटी घोषित कराने की मांग करेगा।

एक शहर के पब्लिक स्पेस में ध्वनि की भी भूमिका रहती है। जिस मुल्क में मंदिर मस्जिद के ऊपर लाउडस्पीकर लगाने के लोग पिछले अस्सी नब्बे साल से दंगे हो जाते हैं उसी मुल्क के एक राज्य बिहार में हार्न बजाने को लेकर भयंकर किस्म की सहनशीलता देखी जाती है। पूरा शहर इस कदर हार्न पर टूट पड़ा है जैसे किसी सब्जी मंडी में अचानक प्याज पांच रुपये किलो हो गया हो। कार से लेकर बाइक तक में हार्न बजाने की सुविधा न हो तो ट्रैफिक में फंसे बिहार के लोग अपनी गाड़ी से उतर कर पैदल चलने लग जाएं। उन्हें पता है कि रास्ता नहीं है। अगली कार के पास विकल्प नहीं है मगर अगली कार और पिछली कार दोनों में हार्न से ही सड़क सखी-संवाद होता है। किसी सड़क पर पिछे से आती कार से हार्न की ध्वनि ऐसे निकलती है जैसे गाड़ीवान कह रहा हो हट हट। सामने सड़क खाली भी होगी तो भी अगली कार वाला हार्न से ही जवाब देता है कि चल चल। चल निकल। दूसरी तरह से कोई गाड़ी आ रही हो तो वो ऐसे हार्न बजायेगा कि ये तुम्हारे नहीं मेरे बाप की सड़क है।

जो भी हो बिहार ने ध्वनि प्रदूषण की तमाम थ्योरी को बदल दिया है। यहां की सड़कों पर पाई जाने वाली हार्न सहनशीलता किसी भी प्रकास से प्रदूषण नहीं है। बल्कि प्रदूषण तो वो फैला रहे हैं जो हार्न के खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं। पटना क्लब की दीवार पर ऐसा ही एक बोर्ड लगा है। यहां के हार्न प्रिय नागरिकों ने उचित ही ध्यान नहीं दिया. वे इस बोर्ड के सामने से भी हार्न बजाते हुए गुज़रते हैं। शायद अपना विरोध दर्ज कराते हों। लिहाज़ा थक हार कर मैं भी सड़कों पर उत्पादित ध्वनि ऊर्जा को डिविडेंड में बदलने की सोचने लगा। कैसे इस ध्वनि ऊर्जा का इस्तमाल राष्ट्र की प्रगति में किया जा सकता है। शायद इस मामले में मैंने सौर ऊर्जा को विकल्प बनाने की बात करने वाले नरेंद्र मोदी को भी पीछे छोड़ दिया है ! काश कोई राहुल देव बर्मन या स्नेहा खानवलकर यहाँ की सड़कों पर हार्न ध्वनि के विविध रूपों की रिकार्डिंग करते । वो दुनिया में हार्न संगीत के जनक बन जाते ।

मैंने यहाँ बजने वाले हार्न की कुछ श्रेणियाँ बनाई हैं । लहरिया हार्न,बाँसुरी हार्न,हारमोनिया हार्न,बमकल( क्रोधित) हार्न,आनंदित हार्न,ऐ सखी सुनो न हार्न,केंकीयाइल हार्न(केंकियाना श्वान की चीख का एक प्रकार है ), चल गुड्डू सिनेमा हार्न,फुंफकार हार्न,विधायक हार्न,थानेदार हार्न,गुंडा हार्न । इसी में एक कैटगरी है देखावन और सुनावन हार्न की। इसका मकसद होता है अपने हार्न को सुनाना और साथ ही सड़क पर चलने वाले सरकार की तरह बेखबर यात्रियों का ध्यान गाड़ी की तरफ आकर्षित करना। सदाबहार हार्न वो हार्न ध्वनि है जिसके बजने का संबंध सड़क के खाली होने या जाम होने से नहीं है। वो हर हार में बजता है। हार्न ध्वनि को आप पश्चिमी संगीत के लिहाज़ से भी बाँट सकते हैं । राॅक-हार्न,जैज़-हार्न,ट्रम्पेट हार्न,हिप-हौप हार्न । पटना के लोग जिस कलात्मक तरीके से  प्रेशर हार्न का इस्तमाल करते हैं उसे देखकर ए आर रहमान भी शर्मा जाए । कोई भी नवोदित संगीतकार जो ध्वनि को लेकर हो रहे सार्वजनिक और मौलिक प्रयोग से प्रेरणा पाना चाहता हो तो उसे रोज़ चार घंटा बिहार या पटना की सड़कों पर हार्न कला की रिकार्डिंग करनी चाहिए। नई प्रतिभाओं को इसका अवसर प्रदान करने के लिए बिहार सरकार को एक ‘हार्न पार्क ‘बनाना चाहिए जहाँ लोग अपनी हार्न कला का प्रदर्शन कर सकें और दुनिया भर से सैलानियों को बिहार आने का एक और बहाना मिले ।

मैं सही में सुबह उठकर इस हार्न के आरोह-अवरोह को सुनने लगा। ये क्या कहते हैं। किससे कहते हैं। किस तरह से कहत हैं। हर हार्न की अपनी एक देहभाषा होती है । कुछ हार्न तो बस आगाह कर विलुप्त हो जाते हैं मगर कुछ देर तक गूँजते रहते हैं जैसे पहाड़ी से टकरा कर आवाज़ लौट आई हो । कुछ हार्न बेहद हल्के होते हैं जैसे किसी ने कस के चिकोटी काटी हो लेकिन अगला मचल कर तुरंत शांत हो गया हो । गलियों में बजने वाले कुछ हार्न फेरीवाले की तरह सुनाई पड़ते हैं । कई बार तो ऐसे बजते हैं जैसे निश्चित नहीं हो कि कोई ग्राहक जागा भी हुआ है। कुछ हार्न ऐसे बजते हैं जैसे नाक खोदते वक्त आवाज़ बदल जाती है । हार्न ध्वनि में शीघ्रता के आधार पर भी आप उसकी भाषा पकड़ सकते हैं । कई बार लगता है कि गाड़ीवान पतंग लूटकर खुशी के मारे नंगे पाँव भागा जा रहा है तो कोई इतनी जल्दी में है कि बिना लोटा लिये खेतों की तरफ़ भागने का रास्ता मांग रहा हो । कुछ की भाषा चिढ़ाने की भी होती है । कई हार्न हड़बड़िया होते हैं तो कुछ हार्न अभ्यास मैच की तरह बजाए जाते हैं ।

पटना शहर के लोग बिना हार्न के नहीं रह सकते । हार्न उनके जीवन का अभिन्न अंग है। इसका सामाजिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण होना चाहिए कि क्यों हर कोई हार्न बजा रहा है। क्या वो चिढ़ा हुआ है, क्या वो बेसब्र हुआ जा रहा है, क्या वो दादागिरी करना चाहता है आदि आदि।  अगर कोई कार कंपनी पटना में अपनी बिक्री बढ़ाना चाहती है तो उसे हर कार में हार्न के पांच से दस विकल्प देने चाहिए। सिर्फ गाड़ीवान ही क्यों हार्न बजाए। कार की हर सीट पर बैठे लोगों को हार्न बजाने का समान अवसर और अधिकार मिलना चाहिए। आखिर हार्न न बजाने का अभियान का यहां विरोध क्यों हो रहा है।  इस शहर को हार्न बजाने की बीमारी लग गई है । एक ही तरीका नज़र आता है कि बिहार सरकार हार्न बजाने को मान्यता दे दे और हार्न टैक्स लगाए जिससे राजस्व में वृद्धि हो। इसे प्रोत्साहित करने के लिए बिहार में हार्न दिवस मनाना चाहिए । इस दिन बिहार बंद हो और हर व्यक्ति जहाँ है जैसा है के आधार पर दिन भर हार्न बजाए । लोग गांधी मैदान में जुटें और वहां भी घंटों हार्न बजाएं। बिहार को अपना राजकीय चिन्ह भी हार्न कर देना चाहिए। हद है।

(यह लेख प्रभात ख़बर में प्रकाशित हो चुका है)