हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है !

जो बोलेगा वही सुना जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगमन और उनके प्रति आकर्षण के कई कारणों में बोलना एक प्रमुख कारण है। पंद्रह अगस्त के पहले भाषण की तमाम प्रतिक्रियाओं को देखते हुए आसानी से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है। ज़्यादातर टिप्पणीकार उनके बोलने के तरीके को लेकर मोहित हैं। प्रधानमंत्री मोदी भी अपने बोलने की रोचकता के प्रति सजग हैं। इसलिए वे इसमें बदलाव करते रहते हैं। कपड़े से लेकर पगड़ी तक सब उनकी देहभाषा के शब्द बन गए हैं। हर किसी के होते हैं मगर उन्होंने इसे काफी औपचारिक रूप दे दिया है। बोलने के पैमाने पर हमेशा खरे उतरते भी रहे हैं जबकि इस बात को लेकर विवाद होता रहता है कि उन्होंने क्या बोला या कुछ बोला भी कि नहीं। कई बार उनकी बोली गई बातों की त्रुटियां भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लेती हैं। पंद्रह अगस्त के भाषण के बाद कई लोगों से मिला जो ख़बरों की दुनिया के पाठक-दर्शक तो हैं मगर बेहद साधारण लोग। कैसा लगा। इसके जवाब में उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। दवा की दुकान के काउंटर पर बैठे सज्जन के चेहरे पर जैसे जादू बिखर गया हो। भाषण तो काफी अच्छा था। कितना बढ़िया बोले। क्या बोले मेरे इस सवाल पर उनका उत्तर जानकारों की तरह सटीक तो नहीं रहा मगर कोई भी उस व्यक्ति के चेहरे को पढ़ कर बता सकता है कि चौबीस घंटे बाद भी प्रधानमंत्री के बोलने के असर से नहीं निकला है। एक चाय वाले ने कहा कि बहुत बढ़िया लगा। लगा कोई प्रधानमंत्री बोल रहा है। मेरी सोसायटी से रंगरोगन का काम निपटा कर जा रहे एक मज़दूर ने कहा कि मज़ा आ गया जी। ये आदमी कुछ कर देगा। देखना।

मोदी शायद इन्हीं लोगों का ख़्याल कर अपने बोलने को लेकर बेबाक हैं। ल्युटियन दिल्ली के विशेषज्ञ भले इस बात को स्वीकार न कर पायें मगर यही वो तबका है जो आज भारत की वर्किंग आबादी का बड़ा हिस्सा है। मोदी इस तबके के दिलों में उतर जा रहे हैं। यह तबका उनकी भावना और बोलने की शैली से नाप रहा है। जितना ऊंचा पिच होता है उतनी ही गहरी सुनने वाले की सांसे हो जाती हैं। उन्हें लगता है कि प्रधानमंत्री उनकी चिन्ताओं को व्यक्त तो कर रहे हैं। पंद्रह अगस्त के दिन प्रधानमंत्री ने फिर से अपने इस समर्थक तबके में पैठ जमा ली। मध्यमवर्ग तो है ही। लोग एक नेतृत्व में कई खूबियों को देखना चाहते हैं। वो कई कमियों को नज़रअंदाज़ भी कर सकते हैं अगर कुछ पैमाने पर नेतृत्व खरा उतरे। उनसे से प्रमुख ख़ूबी है बोलना। यह मांग उतनी प्रमुख न होती अगर मनमोहन सिंह एक दशक तक चुप न रहते। भारतीय परंपरा में मौन को सराहा गया है मगर स्थायी मौन को नहीं। उस मौन को नहीं जो कभी बोले ही नहीं बल्कि उस मौन को जो किसी रणनीति के हिसाब से बोलने का समय तय करे। मनमोहन सिंह ने मौन का कुछ और मतलब समझ लिया। मोदी ने मौन का सही मतलब समझ लिया है। जब लगे कि स्थिति ठीक नहीं है चुप रहो। जब लगे कि स्थिति काबू में है सामने से आकर ख़ूब बोलो।

आज के अख़बारों और टीवी के टिप्पणीकारों ने बुलेट प्रुफ शीशे के हटाये जाने को काफी प्रमुखा दी है। सुरक्षा के लिहाज़ से यह एक साहसिक फ़ैसला है पर एक तरह से सोचिये कि अगर तमाम बंदोबस्त के बीच कोई चूक हो भी जाए तो वह बुलेट प्रुफ शीशा क्या कर लेगा। उसका वहां होना यही बताता है कि सुरक्षा एजेंसियों को अपनी ही तैयारी पर भरोसा नहीं है। लाल किले के आस पास जो सुरक्षा होती है उसे भेदना इतना आसान नहीं है। इतनी सी बात अगर मनमोहन सिंह ने समझ ली होती तो वे शीशे को हटा देते। मगर बक्से में बंद रहने की आदत ने उन्हें हर जगह बक्से में बंद ही रखा। मोदी ने सिर्फ सुरक्षा कारणों से बुलेट प्रुफ शीशे को नहीं हटवाया। यह संवाद का स्वाभाविक तरीका भी है। जो लोग पब्लिक कम्यनिकेशन करते हैं वो ऐसी बंदिशों को हटा ही देते हैं। शीशा हटते ही सब मोदी को साफ साफ देख रहे थे। मोदी का बोलना ऐसे प्रभाव डाल रहा था जैसे वे हर सुनने वाले से आंखें मिलाकर बात कर रहे हों। वो हर तरफ देखते हैं। हर तरफ़ बोलते हैं। मनमोहन सिंह को बुलेट प्रुफ़ शीशा जितना सुरक्षा कवच के लिए नहीं चाहिए था उतना अपने न बोल पाने की सकुचाहट को छिपाने के लिए। मोदी जानते हैं। बोलना है तो सामने से बोलो। सुनने वाले को भी लगेगा कि बोलने वाला गंभीर है।

ऐसा नहीं है कि हिन्दुस्तान की जनता सिर्फ बोलने वाले नेता पर ही दिल लुटाती रही है। महात्मा गांधी बहुत अच्छे वक्ता नहीं थे। वी पी सिंह मोदी की तरह माइक पर टूट कर नहीं बोलते थे। देवेगौड़ा और गुजराल तो मनमोह सिंह परंपरा के ही वाचक नेता माने जायेंगे। अटल बिहारी वाजपेयी बहुत अच्छे वक्ता थे मगर वाजपेयी आलोचक किस्म के वक्ता था। उनके बोलने में धार तो थी मगर व्यंग्य उसे हल्का कर देता था। वो सौम्यता की ओट में ख़ुद को छिपाये रखे। फिर भी जनता ने उन पर विश्वास तो किया मगर सिर्फ बोलने की शैली को लेकर नहीं। जब वक्त आया तब। मोदी को भी वक्त ने तय किया है और मोदी ने उस वक्त को अपने हिसाब से ढाला भी है। याद कीजिये जब सोनिया गांधी उभर रही थीं। सकुचाते हुए भी वो माइक पर प्रमुखता से अपनी बात कहती थीं। बात का असर होता था। तालियां बजती थीं। इस चुनाव में उनका बोलना था ही नहीं। वे बोली भीं तो रैलियों में। बाकी दस साल वे भी चुप रहीं। शुरू में मनमोहन सिंह को बोलने के पैमाने पर नहीं देखा गया । कम से कम पहले कार्यकाल में। सबने उनके काम को अच्छा माना है और इसी कमी को हमेशा अनदेखा किया तब जब बीजेपी लगातार उनकी इस कमी को उजागर करती रहती थी मगर उसे कामयाबी नहीं मिली। दूसरे कार्यकाल का असर इतना ख़राब रहा कि उनके समर्थक भी कहने लगे कि प्रधानमंत्री संवाद ही नहीं करते हैं। मनमोहन सिंह में संवाद की क्षमता कभी थी ही नहीं। उन्हें कोई सुनना भी नहीं चाहता था। इसलिए वे अपने काम को कभी बता भी नहीं सके। जब कभी कहा भी तो  इस तरह से कहा जैसे किसी दूसरे का किया हुआ बखान कर रहा हो। लेकिन मनमोहन की यह कमी और भी बड़ी लगने लगी जब उसे पूरा करने के लिए कांग्रेस पार्टी में भी कोई नहीं था। कांग्रेस में भी कोई नेता नहीं था और है जो मोदी के स्तर पर आकर बोल सकता और मनमोहन का बचाव कर सकता। ये मोदी का बोलना ही था जो उन्होंने खुद को अन्ना आंदोलन के समय बीजेपी कांग्रेस भाई भाई की छवि से अलग कर लिया। उनके बोलने के प्रभाव के आगे बीजेपी पर लगने वाले आरोप पर्दे के पीछे चले गए। मोदी कभी भी कैज़ुअल या सामान्य तरीक से नहीं बोलते। उन्होंने स्थापित कर दिया है कि वे बोलने आ रहे हैं मतलब गंभीर हैं।

जो नेता बोल नहीं सकता वो अब रणनीतिकार हो सकता है मगर राजनेता नहीं। ऐसा नहीं है कि पहली बार हो रहा है कि कोई बोलने वाला आया है। पिछले दस साल में यह पहली बार ज़रूर है। कांग्रेस ने बोलने का मतलब सिर्फ मोदी का फेंकू होना या फेंकना समझ लिया। कांग्रेस को लगा कि बिना बोले ही काम चल जाएगा। मोदी बोले जा रहे थे और कांग्रेस चुप। पंद्रह अगस्त के भाषण का जो राजनीतिक प्रतिकार कांग्रेस ने दिया है उससे लगता है कि ये पार्टी खुद ही समाप्त होना चाहती है। इतना रूटीन जवाब तो प्रधानमंत्री मोदी ने भी उम्मीद नहीं की होगी। कांग्रे ने एक भी बोलने वाला नेता खड़ा नहीं किया।

राजनीति में जनता,समर्थक और जो किनारे बैठे हैं उन तीनों को साधने के लिए बोलना एक अहम हथियार है। आप बोलकर दलील पैदा करता है, अपने समर्थकों को तर्क का हथियार देते हैं। ज़रूर बोलना प्रोपेगैंडा का हिस्सा है पर बिना प्रोपेगैंडा के राजनीति कहां और कब हुई थी। एक नेता जब अपने आलोचकों को धाराशाही करता है तो वो समर्थकों को भी संतुष्ठ कर रहा होता है जो बाद में उसके चुप हो जाने के बाद बोलते हैं। इस मामले में राहुल, मुलायम,मायावती और नीतीश कुमार सब फेल हो जाते हैं। नवीन पटनायक का नहीं मालूम लेकिन ममता बनर्जी भी अच्छी और आक्रामक वक्ता हैं। एक बात का ध्यान रखियेगा। राजनीति में जब वक्त ख़राब होता है तो अच्छे वक्ता भी पिट जाते हैं। मोदी का वक्त अच्छा था इसलिए उनका बोलना फार्मूला बन गया है। वो एक गहरी निराशा के बाद आए हैं। इसलिए वे किसी ग्रह नक्षत्र के कारण नहीं आए बल्कि राजनीतिक हालात के कारण आए। विकल्प कहां था। किसने कहा कि हमें वोट दो। सबने कहा कि मोदी को वोट मत दो। मोदी ने कहा सिर्फ मुझे वोट दो।

मोदी का बोलना तब भी जारी रहता है जब वे नहीं बोलते हैं। वो बहस पैदा करते हैं। जिसके बहाने उनके बारे में बोला जाता रहता है। लिखा जाता रहता है। चुनाव के समय सिर्फ मोदी की सभा होती थी। ल्युटियन दिल्ली वाला मीडिया लिखा करता था कि वे अपनी पार्टी के नेताओं के पर कतर रहे हैं। पार्टी में दूसरे नेताओं को बढ़ने नहीं दे रहे हैं। इसे मोदी की तरफ़ से भी सोच कर देखिये। मोदी अगर हर रैली में न जाते तो क्या मीडिया हर रैली को प्रमुखता से कवर करता। राजनाथ सुष्मा या उमा भारती की सभा को प्रमुखता से कवर नहीं करता। इसलिए मोदी ने खुद ही बोलने का मोर्चा संभाल लिया। जब बोल रहे होते थे तब सोशल मीडिया की उनकी टीम या समर्थकों की टीम उनकी बातों को प्रचारित कर रही होती थी। व्हाट्स अप पर कार्ड बनाकर बांटे जा रहे थे। बाकी नेता बोल कर चले जा रहे थे। कहीं कोई चर्चा तक नहीं।

कुलमिलाकर मोदी ने बोलने को रणनीति में बदल दिया है। ख़ुद बोलो और जो भी बोलो उसे दिन रात बोलो। सामने से बोले और ख़ुद बोलो और हमला करो। चर्चा हो इसलिए वे हर रैली में अलग अलग बोलते थे। सबको याद रहे इसलिए अलग अलग बातों के साथ कुछ बातों को बार बार दोहराते रहे थे। मायावती की तरह नहीं कि एक बार लिख लिया और चुनाव भर पढ़ती रहीं। जैसे इम्तहान के लिए रट रही हों। मोदी के प्रवक्ता भी वही बोलते थे जो मोदी बोलते थे, कुछ नहीं होता था तो प्रवक्ता मोदी के बारे में बोलते थे।

नीतीश कुमार हों या अखिलेश यादव दोनों ही संवाद में मोदी के मुकाबले कहीं नहीं ठहरते। दोनों बोलते अच्छा हैं मगर सघनता नहीं हैं । एक सीमा के बाद वे कम बोलने की विनम्रता का शिकार हो जाते हैं। मोदी को लगता है ज़्यादा बोलना चाहिए नीतीश को लगता है कि कम बोलना चाहिए। राजगीर में नीतीश का भाषण मोदी पर भारी पड़ गया था। पूरे चुनाव में वही एक भाषण था जो मोदी पर भारी पड़ा लेकिन उसे खुद नीतीश और उनके नेता आगे नहीं ले जा सके।

कुलमिलाकर संवाद में अभी भी बीजेपी या मोदी को आम आदमी पार्टी ही टक्कर देती है। संवाद प्रोपेगैंडा से आम आदमी पार्टी ने बीजेपी को दिल्ली में सरकार बनाने से रोक दिया। आम आदमी पार्टी ऐसा इसलिए कर पाती है कि उसके पास संगठित टीम है। भले ही कम संसाधन वाली टीम हो मगर उसकी रणनीति कारगर है। बीजेपी को परेशान कर देती है। बोलने के लिए उकसा तो देती है। आप के नेता भी ट्वीटर पर अपने नेता या पार्टी की रणनीति को लेकर प्रचारित करते रहते हैं। व्हाट्स अप पर प्लेट बनाकर डालते रहते हैं।

इस प्रक्रिया में लतीफा एक नया राजनीतिक हथियार बनकर उभरा है। एक दूसरे के नेताओं का मज़ाक उड़ाकर भी राजनीतिक रूप से कमज़ोर किया जाता है। इन लतीफ़ों में विरोधी नेता को कमज़ोर या लचर दिखाया जाता है। इससे विरोधी नेताओं के समर्थकों का विश्वास तक हिल जाता है। यह खेल बीजेपी या नमो समर्थक बड़े पैमाने पर करते हैं और छोटे पैमाने पर आप करती है। आज कल कांग्रेस या कांग्रेस समर्थकों की तरफ से ऐसे प्रयास दिखते हैं मगर कम। बाकी दलों के पास ऐसा कोई आइडिया नहीं है। सोशल मीडिया ने मोदी को बीजेपी से बाहर कार्यकर्ता बनाने का मौका दिया। नमो फैन्स के नाम पर ऐसे समर्थक बन गए जो बीजेपी के अपने कार्यकर्त से ज्यादा प्रतिबद्ध थे और आज भी हैं। आप मोदी की ज़रा भी आलोचना कीजिए ये लोग टूट पड़ेंगे। एक तरह का हमलावार दस्ता तैयार रहता है जो मोदी पर हमला करने वालों या सामान्य आलोचकों को दुश्मन घोषित कर धावा बोल देता है । फैन्स के ज़रिये मोदी ने कार्यकर्ता सिस्टम को बाइपास कर दिया है। मोदी जानते हैं कि कार्यकर्ता पर भरोसा करते तो चुनाव नहीं जीत पाते। जब नमो फैन्स ने मोर्चा संभाल लिया तब कार्यकर्ताओं को भी लगा कि जनता मोदी के साथ है एकजुट हो जाओ। इन्हीं नमो फैन्स के दम पर मोदी बाहर के दबाव से पार्टी के शीर्ष पद पर आ गए। मोदी दिल्ली के लिए बाहरी भले हैं मगर आने से पहले उन्होंने इसी दिल्ली के बीच से ऐसे टिप्पणीकारों को प्रभावित किया जो उनमें असीम संभावनाएं देखने लगे। मोदी के बारे में इनकी राय पिछले एक साल से नहीं बदली है। इसलिए बहुत सारे लेख भाषण के प्रति उदार हैं ।

बिहार में नीतीश कुमार ने दावा किया है कि बीस हज़ार गांवों को बिजली पहुंचाई है। अब यही कामयाबी मोदी के पास होती तो वे इसे प्रोपैगैंडा में बदल देते। कहानी में बदल देते हैं कि कैसे दो साल के भीतर कुल कितने दिनों में उन्होंने बीस हज़ार गांवों में बिजली दे दी। दिन रात इसी की बात करते रहते। ट्रेन से लेकर बस तक में लिखवा देते। बिहार के बड़े बड़े लोगों को जुटा लाते कि आइये और बिजली उपलब्धता की तारीफ कीजिए। मगर कोई चर्चा नहीं है। नमो फैन दिन भर और लगातार इस बात का प्रचार कर रहे होते। चारों तरफ होर्डिंग लग जाती। उस गांव के रहने वाले हर व्यक्ति के फोन पर मोदी का व्यक्तिगत मैसेज चला गया होता। व्हाट्स अप पर प्लेट बनाकर चला गया होता। यह काम तो भाड़े के लोगों से भी कराया जा सकता है और मोदी इस बारे में किस्मत वाले हैं कि उनके साथ स्वाभाविक रूप से भी लोग जुड़े हैं। जिन्हें लगता है कि मोदी देश के लिए कुछ करना चाहते हैं। उन्हें एक मौका तो मिलना ही चाहिए। मोदी ने भी ऐसे लोगों की पहचान की और उन्हें लक्ष्य दिया।

इसलिए मोदी को हराने के लिए अब दो ही रास्ते बचे हैं। लगातार काम और बेहतर तरीके से संगठित संवाद। अखिलेश कहते रहते हैं कि आगरा लखनऊ हाईवे बनवा रहा हूं मगर आज तक तस्वीरों में नहीं दिखा। कानून व्यवस्था में ऐसे फिसलते हैं कि हाईवे पर आते आते उनकी गाड़ी का टायर पंचर हो जाता है। बीजेपी में ऐसे ही वक्ताओं की गुणवत्ता अच्छी है अब मोदी ने इस गुणवत्ता को संसाधन में बदल दिया है। हथियार में बदल दिया है। जिनके पास बोलने वाला नेता नहीं है वो अभी कुछ साल तक मोदी से हारेगा। जिनके पास बातों को लगातार बोलते रहने वाली टीम नहीं है वो मोदी से हारेगा। चाहे टमाटर के दाम सौ रुपये हो जाएं या पेट्रोल के अस्सी रुपये। चुनाव रणनीति और एक एक कार्यकर्ता को काम देकर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी यह सब अब भी विपक्षी दलों ने नहीं सीखा तो उन्हें ख़ुद मोदी को लिख देना चाहिए कि आप जीतते रहिए। हम हारते रहेंगे।

मोदी विरोधी कहते रहेंगे कि मोदी बहुत भाषण दे रहे हैं। उन भाषणों में अब दोहराव है। नई बात नहीं है। पहले भी सुन चुके हैं। मगर विरोधी अपनी तरफ से संवाद का कोई विकल्प नहीं दे रहे हैं। राजनीतिक संवाद कभी भी स्थगित नहीं हो सकता। मोदी लगातार बोलते रहते हैं। अगस्त महीने में ही उनकी चार पांच भाषण हो गए हैं । पर मैंने देखा है कि उनके बोलने का असर होता है। जब तक वे बोलते हैं लोगों को लगता है वाह कोई बोल रहा है। उन्हें इस बात से मतलब नहीं होता कि पहले भी बोला जा चुका होता है। मोदी से अब वही नेता टक्कर लेगा जो बोलने में अच्छा ही नहीं बल्कि विश्वसनीय होगा। धारदार बोलेगा। ऐसे तर्क देगा जिससे उसके समर्थक भी लैस हो जाएं । समर्थकों का आत्मविश्वास बढ़ जाए। मोदी के भाषण का आपरेशन किया जा सकता है लेकिन बोलने के असर को नकार नहीं सकते। जनता काम भी देख लेगी। मोदी भी जानते हैं जब तक इम्तहान का दिन नहीं आता तब तक के लिए बोलना स्थगित नहीं किया जा सकता।

ऐसा नहीं हो सकता है कि आप चुप चाप दस साल काम करें और आखिर के दो महीने में बोल लें। मोदी ने चुनाव से एक साल पहले बोलना शुरू किया था। लोगों को लग गया कि ये नेता बोल सकता है। बोलना मतलब फैसला करने का साहस, बोलना मतलब कहने की हिम्मत। बोलना मतलब कुछ करेगा। चुनाव के दौरान कई लोग कहते थे कि जितना बोल रहे हैं उसका दस प्रतिशत भी कर दें तो बहुत हैं। अब इतना बोल रहे हैं तो कुछ न कुछ करेंगे ही।  मोदी की शैली आराम से नकल की जा सकती है। उनकी शैली भी कोई मौलिक नहीं है। वे जिस तरह से बोलते हैं राजनीतिक संवाद के पाठ्यक्रम का पुराना चैप्टर ही है लेकिन वे इसकी परवाह किये बगैर ऐसे बोलते हैं जैसे पहली बार कोई नेता बोल रहा है। यही तो प्रोपेगैंडा है। क्या किसी ने राहुल या अखिलेश या नीतीश को बोलने से मना किया है। प्रोपेपैंडा का मैदान सबके लिए खुला होता है और ये राजनीति का जायज़ तरीका है। काउंटर प्रोपेगैंडा कहां हैं।

शुक्रिया मनमोहन सिंह दस साल तक बोलने की मांग को पैदा करते रहने के लिए जिसे मोदी ने पूरा कर दिया। मोदी अगर ब्रांड हैं तो बोलना उस ब्रांड का प्रोडक्ट। किसे फर्क पड़ता है कि क्या बोला गया, कैसे बोला गया मगर बोला गया इससे भी बहुत फर्क पड़ जाता है। राजनीति में वही अच्छा बोलता है जो दिन भर अपने विरोधी के बारे में सोचता है, अपने बारे में सोचता है और बोलने के असर के बारे में सोचता है। मुझे लगता है मोदी तब भी बोल रहे होते हैं जब वे नहीं बोलते। पता नहीं उन अलग अलग कमटियों या कमेटी का क्या हुआ जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी के भाषण की तैयारी के लिए बनाया गया था। उल्टा यही हुआ होगा कि ये कमेटी मोदी से बोलने का ट्यूशन लेकर लौट गई होगी। बिना बोले जो लोग राजनीति करना चाहते हैं उन्हें एक काम करना चाहिए। मोदी की टीम में शामिल हो जाना चाहिए जहां सबको चुपचाप काम करना पड़ता है। उनको प्राण पर फिल्माया गया वो गाना गाना चाहिए। हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है। हम कुछ नहीं बोलेगा साब जी।