हमारे घर फ्रिज़ आया है

फ्रिज़ सफेद ही अच्छा लगता है । उन्नीस सौ चौरासी की एक दोपहर हमारे घर बैठी पड़ोस की चाची ने कहा था । फ्रिज़ आ रहा था इसलिए कई लोग पिताजी के साथ बैठकर उसके रंग पर चर्चा कर रहे थे । क्योंकि हममें से किसी को नहीं मालूम था कि फ्रिज़ सफेद ही अच्छा लगता है । पिताजी गांव से लौटे थे । गेहूं और गन्ने का पैसा मिला था । थोड़ा बहुत पैसा पड़ोस के चाचा जी से भी लिया गया था । फ्रिज़ आएगा । अब और इंतज़ार नहीं हो सकता । इसके पहले हमारा भी सिर्फ दूसरों के घरों में फ्रिज़ देखने का अनुभव था । मालूम नहीं था कि फ्रिज़ में रखे खाने का स्वाद कैसा होता है । पानी ठंडा होता है इसका रोमांच था लेकिन स्वाद नहीं । ठंडा मतलब सुराही का पानी होता था । जिसे हम हर गर्मियों में पटना के गंगा नदी के किनारे बिकने वाली सुराही के ढेरों में से चुन कर लाते थे । हमारे घर अब फ्रिज़ आने वाला था । सफेद, लाल और हल्का आसमानी । ब्रांड गोदरेज और केल्विनेटर । और भी होंगे मगर पता नहीं । खैर तय हुआ कि सफेद नहीं आसमानी आएगा ।

क्यों आ रहा था फ्रिज़ ? पड़ोस में किसी के पास नहीं था । लिहाज़ा दबाव भी नहीं था कि उनके यहां है और हमारे यहां नहीं । फ्रिज़ को लेकर हीनभावना नहीं थी । तभी अमरीका में रहने वाले हमारे दूर के रिश्तेदार के दूर के संबंधी आए । उनका हमारे घर आना हुआ । वो इस बात से हैरान थे कि हमारे यहां फ्रिज़ नहीं है । पिताजी को मालूम नहीं था कि इसके क्या उपयोग हैं ? रिश्तेदार तो चले गए मगर पिताजी के ज़हन में फ्रिज़ खरीदना एक लक्ष्य बन गया था । उनके पास चवालीस सौ रुपये जमा हो गए थे । खुशी इतनी थी मानो चांद पर ज़मीन बुक करने जा रहे हों । हम सब खुश थे । कहां रखेंगे इसकी कोई जगह नहीं थी । छोटे छोटे कमरे और छोटी रसोई । हम सब कई भाई बहन दरवाज़े पर खड़े थे । ठेले पर लाद कर आसमानी फ्रिज़ घर आ रहा था । जो छोटे थे बीच बीच में बाहर निकल कर अपडेट देते थे कि ठेला इतना करीब आ गया है । फलां के घर के पास है । हमारी कौतुहल में धीरे धीरे बाकी लोग भी आ गए । अब कोई दरवाज़े पर नहीं खड़ा था । सब गेट पर आ गए थे । उसके आते ही मेरी एक बहन ने पड़ोस की चाची को आवाज़ दी । चाची जल्दी आइये, फ्रिज़ आ गया है । वो भागती हुई आईं । वो भी बहुत खुश । जैसे उनके घर में भी फ्रिज़ आ रहा है । उधार के पैसे में उनका भी हिस्सा था ।

फ्रिज़ आ गया । रखें कहा । खूब मंत्रणा । नतीजा कि बाहर बरामदे में ही जगह बचती है । सलाह कि धूप से रंग हल्का हो जाएगा । फिर उसके लिए चीक वाले को बुलाया गया कि भाई जल्दी से बारामदे को ढंक दो । फ्रिज़ को धूप न लगे । फ्रिज़ ऑन हुआ तो कम से कम पंद्रह लोगों ने दरवाज़ा खोल कर देखा कि अच्छा ऑन हो गया है । ठंडा लगता है क्या । फ्रिज़र में हाथ डालने से हाथ जम जाएगा ? कश्मीर में इतनी ही ठंड होती होगी क्या जितनी फ्रिज़र में ? तभी कनेक्शन वाले ने बोला इसमें कुछ रखेंगे तब तो पता चलेगा । क्या रखें ? उसने कहा खाना सब्ज़ी ये सब रखिये । पर ये सब तो ख़त्म हो चुका है । सब्ज़ी तो रोज़ आती है और रोज़ बनती है । आलू बचा है उसे रख सकते हैं क्या ? बोला आलू नहीं । जो खराब हो सकता है उसे रखिये । उसने समझाया कि अब सुबह शाम हरी सब्ज़ी लाने की ज़रूरत नहीं । एक बार खरीद कर रख दीजिए । बस पिताजी विद्रोह कर गए । यह नहीं होगा । बासी सब्ज़ी कैसे खायेंगे । फ्रिज़ को लेकर सांस्कृतिक टकराव शुरू हो गया । लेकिन मेरे घर में ऐसा कुछ नहीं मिला जिसे तत्काल फ्रिज़ रख सकें । खाना पंद्रह लोगों के परिवार में कहां बचता है । फ्रिज़ में एक जग में पानी भर कर रखा गया । कनेक्शनवाले ने कहा पानी रखने का बोतल आता है ले आइयेगा । इस ट्रे में बर्फ जमाइयेगा । बोतल आ गया । मगर उसके अलावा अन्य चीज़ों के रखने की समस्या का समाधान नहीं हुआ । कोई सामान ही नहीं होता था । बहुत दिनों तक फ्रिज़ का ठंडा पानी पीते रहे । पड़ोसियों के घर मेहमान आने पर ठंडा पानी जाता रहा ।

एक दिन एक ऐसे रिश्तेदार का आना हुआ जिनके पास कई साल से फ्रिज़ था । उन्होंने फ्रिज़ खोल दिया । उसमें सिर्फ बोतल भरा था । बर्तन कटोरे में पानी था । वो हंसने लगे । बोले आप लोगों को फ्रिज़ में क्या रखा जाता है यहीं नहीं मालूम । उन्हें हम पर हंसने की आदत थी । सो बुरा लगा । फ्रिज़ का नहीं होना एक सामाजिक आर्थिक अंतर था मगर फ्रिज़ में किसी चीज़ का नहीं होना अलग सामाजिक आर्थिक अंतर । फ्रिज के खालीपन ने हमारी हैसियत एक बार फिर तय कर दी । या गिरा दी । हम सब आहत थे । ताजा खाना खाने वाले हम सब फ्रिज़ की गोद भऱने के लिए कुछ बचाने लगे । ताकि उसमें रखा जा सके । साहूकार से पूछ कर कुछ ऐसी चीज़े मेरे घर में पहली बार आईं जो नहीं आती थी । सॉस, जैम और जेली । यह खाने के लिए कम रखने के लिए ज़्यादा आते थे । धीरे धीरे इन्हें खाने भी लगे । हमारे घर में सुबह शाम सब्ज़ी कम खरीदी जाने लगी । ताकि फ्रिज़ भरा रहे । और हमारा सामाजिक सम्मान बचा रहे । खाली रहने पर अच्छा नहीं लगता है । यह अहसास होने लगा था । इसीलिए फ्रिज़ के दरवाज़े का एंगल ऐसा रखा गया कि खुलते वक्त कोई झांक कर देख न ले कि इसमें क्या रखा है । फ्रिज़ हमारी आबरू का हिस्सा बन गया । और भी घरों में मैंने देखा है फ्रिज़ के दरवाज़े के खुलने की दिशा को लेकर काफी मंत्रणा होती है । सब ध्यान रखते हैं कि मेहमान यह न देख लें कि फ्रिज़ में क्या रखा है ? मैं रंग की बात कर रहा था लेकिन कह गया कहानी । उपभोक्ता चीज़ों के सामाजिक जीवन से जुड़ने की कहानी । आज कल बाज़ार में फ्रिज़ कई रंगों में आता है । हरा, धानी, नीला, गुलाबी । सफेद कम । वो तो दवा की दुकान में या अस्पताल में रखे जाने वाले फ्रिज़ होता है ।

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