राष्ट्र का भाव- पार्ट टू

Vichar Piyush 2हिन्दू महासभा, राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ, जनसंघ आदि की दृष्टि में समान धर्म समान भाषा, समान संस्कृति, समान जाति एवं समान इतिहास वाले लोग एकराष्ट्रिय कहे जा सकते हैं। ऐसे राष्ट्रिय लोगों का देश ही ‘एकराष्ट्र’ और ‘हिन्दू राष्ट्र’ है। उपर्युक्त संस्थाओं के मतानुसार “मुसलमान, ईसाई आदि भारत-राष्ट्र के राष्ट्रिय या नागरिक नहीं हो सकते। हां, यदि वे हिन्दूधर्म में सम्मिलित हो जाएं, यहां के धर्म, संस्कृति, भाषा को अपना लें, हिन्दू हो जाएं, तभी वे इस राष्ट्र के राष्ट्रिय हो सकते हैं।“ उक्त संस्थाओं को वेदादि-शास्त्रसम्मत ‘जन्मना वर्णव्यवस्था’ पर विश्वास नहीं है। तभी तो वे किसी को भी भले ही वह जन्मना मुसलमान या ईसाई हो, शुद्ध कर हिन्दू, ब्राह्मणादि बनाने की चेष्टा करते हैं। इन्हें शास्त्रोक्त आचार-विचार,विवाह आदि किसी में विश्वास नहीं है। वस्तुत इनका हिन्दुत्व ‘मुस्लिम विरुद्धत्व’ ही है। श्री गोलवलकरजी तो अपने पुस्तक हमारी राष्ट्रियता में यह भी कहते हैं कि मुसलमान भले ही इस्लाम –मज़हब मानता रहे मसजिद और कुरान का अनुकरण एवं अध्ययन करता रहे यदि वह अपने को हिन्द कहता है, हिन्दू ढंग का नाम रखता है, हिन्दू ढंग की वेश-भूषा धारण करता है तो वह हिन्दू राष्ट्र का राष्ट्रिय भी हो सकता है।

किन्तु एक शास्त्रविश्वासी आस्तिक इन सब बातों को सर्वथा निराधार ही समझता है। वेदों, स्मृतियों एवं नीतिग्रंथों में राष्ट्र शब्द के जो अर्थ ग्राह्य हैं, उनसे उक्त बातों का कोई संबंध नहीं है। वेदादि-शास्त्रों के अनुसार कोई भी जनपद,देश या राज्य राष्ट्र शब्द का अर्थ होता है। वेदों में अनेक स्थलों पर राष्ट्र शब्द आया है। सायण, उव्वट, महीधर आदि भाष्यका आचार्यों ने ‘राष्ट्र’ शब्द का देश,जनपद एवं कहीं राज्य अर्थ किया है। मनु आदि ने ‘सप्तांग’ राज्य बतलाया है। उन सप्तांगों मेंराष्ट् का एक अंग माना गया है। यहां राष्ट्र शब्द का जनपद अर्थ किया है। मेधातिथि जनपद-समूह को राष्ट्र कहते हैं। इस तरह कहीं-कहीं राष्ट्र शब्द संपूर्ण राज्य का भी वाचक माना गया है। मनु ने राष्ट्र का अर्थ देश किया है। याज्ञवल्क्य ने भी कई वचनों में राष्ट्र का उल्लेख देश अर्थ में किया है। महर्षि पराशन ने भी देश के अर्त में ही राष्ट्र शब्द का प्रयोग किया है। कामन्कीय-नीतिसार में भी मनु के अनुसार राज्य के सप्तांग का वर्णन आया है। वहां भी राष्ट्र राज्य का क अंग बतलाया गया है और उसका अर्थ जनपद किया है। (लेखक ने इन उदाहरणों के फुटनोट्स भी दिये हैं जो मैं यहां नहीं टाइप कर रहा हूं। )

‘राजृ-दीप्तो’ इस प्ति अर्थ वाले ‘राजृ’ धातु से कर्म में ‘ष्ट्रन्’ प्रत्यय करने से राष्ट्र शब्द बनता है। अत विविध सामग्रियों से दीप्त देश ही राष्ट्र है। करण-प्रत्यय करने से उस देश को राष्ट्र कहा जाता है, जिस देश में राजा या राज्य दीप्त हो। देश की दीप्ति के सम्पादनार्थ ही धार्मिक, सांस्कृतिक, उच्चजातीय, उच्चभाषा-भाषी जनसमूह भी उपयुक्त हो सकता है। ऐसे जनसमूह से अलंकृत एवं दीप्त देश ही राष्ट्र है।

कहा जा सकता है कि जैसे रंग-बिरंगे फूलों एवं मणियों से माला शोभित होती है, वैसे ही विविध जातियों, विविध धर्मा, विविध संस्कृतियों, एवं विविध भाषाओं से अलंकृत देश ही राष्ट्र माना जाय। अन्य प्रमाणों के आधार पर भले ही इस प्रकार की खिचड़ी को हानिकर सिद्ध किया जाए, परन्तु केवल राष्ट्र शब्द के आधार पर ऐसा करना असंभव नहीं, क्योंकि आखिर परमेश्वर का विराट रूप से अनंत रंग-बिरंगे पदार्थों एवं देशों से राजमान है ही, तभी तो वह विविध रूपों से राजमान होने के कारण ही विराट है।

कौटिल्य तथा कामन्दक के अनुसार धार्मिक जनता एवं बुद्धिमान स्वामी, राजा आदि भी राष्ट्र के अंतर्गत मान्य हैं। कौटिल्य के अनेक वचनों में राष्ट्र शब्द देश के अर्थ में ही उपयुक्त हुआ है। राष्ट्र में जिन जिन वस्तुओं का होना अनिवार्य है, उनका उल्लेख करके कौटिल्य ने उन्हें भी गौणी वृत्ति से राष्ट्र शब्दवाच्य कहा है। उन वस्तुओं में कृषि, धान्य,उपहार, कर, वाणिज्-लाभ, नदी-तीर्थादि-लाभ एवं पत्तनादिजन्य लाभ, सब राष्ट्र के लिए आवश्यक बतलाये गएहैं। राष्ट्र में जिन जिन वस्तुओं का होना आवश्यक है जिन विशेषणों से विशिष्ट होने से देश राष्ट्र हो सकता है, उनका निर्देश भी कौटिल्य ने किया है। जिस देश की रक्षा सीमावर्ती पर्वत, अरण्य, नदी, समुद्र आदि भौगोलिक साधनों से सुगम हो, वह देश स्वारक्ष होकर राष्ट्र है। जिस देश की सुखपूर्वकजीविका या जीवनयात्रा चल सके,वह स्वाजीव है। शत्रुद्वेषी सामन्तवर्ग जिसके वशवर्ती हों, वैसे राजा तथा प्रजा से युक्त देश ‘शक्यसामन्त’ राष्ट्र है। इसी तरह वह देश राष्ट्र है, जो अनिष्ट पंक, पाषाण, ऊषर, विषम, कण्टक, श्रेणी, व्याल, मृगावटी, आदि से रहित हो, जो कमनीय हो। जो देश कृषि,खनिद्रव्य, हस्ती, अरण्य आदि से युक्त, गोवश के लिए अनुकूल,पुरुषों को हितावह, सुरक्षित गोचरभूमियुक्त, विविध पशुओं से संपन्न हो, यथासमय जिसमें वर्षा हो एवं जो जल-स्थल के विविध मार्गों से युक्त हो , वह राष्ट्र है। सारभूत,आश्चर्यपूर्ण, अत्यंत पवित्र तीर्थादि से युक्त, दंड एवं कर आदि को सहन कर सकने वाला, कर्मशील शिल्पी एवं किसानों से युक्त, बुद्धिमान गंभीर धार्मिक स्वामी से युक्त, वैश्य-शूद्रादि वर्णों के लोग जिस देश में पर्याप्त हो, वहां राजभक्त, पवित्र, निष्कपट एवं धार्मिक बन निवास करते हों, ऐसी जनपद-सम्पत से युक्त देश राष्ट्र है। कामन्दक आदि नीतिशास्त्रों ने भी इन्हीं बातों का वर्णन अपने गंर्थों में किया है।

इस विस्तृत विवेचन से स्पष्ट है कि सप्तांग राज्य ही राष्ट्र शब्द का अर्थ है। यो तो वाल्मीकीय-रामायण में ग्रामादि के अर्थ में भी राष्ट्र शब्द आया है। कई स्थलों में उपावर्त या उपद्रव अर्थ में भी राष्ट्र शब्द का प्रयोग किया गया है। ‘अमरकोष’ में राजा के साले को राष्ट्रिय कहा गया है। फिर भी वेदों, उपनिषदों, पुराणों एवं स्मृतियों में राष्ट्र शब्द का जनपद देश एवं राज्य अर्थ किया गया है। उसी राज्य आदि के विशेषण रूप से जनता, राजा आदि भी ग्रहीत होते हैं।

किन्तु राष्ट्र या जनपद के नाम पर किसी जातिविशेष या धर्मविशेष का बहिष्कार अथवा निष्कासन सिद्ध नहीं होता। अत “मुसलमान ईसाई जब हिन्दू बनें या अपना हिन्दू नाम धारण करें तभी वे राष्ट्रिय हो सकते हैं, अन्यथा नहीं”आदि बातें सिद्ध नहीं होतीं। एकभाषा-भाषी या समान-भाषाभाषी होने से यदि एकराष्ट्रियता का सिद्धांत माना जायागा, तब तो बिहारी, बंगला, उड़िया, तेलगु,तमिल, कन्नड भाषाभाषी लोग भी एकराष्ट्रिय नहीं हो सकेंगे क्योंकि उनकी भाषाएं न तो समान हैं न एक। इसी तरह एक धर्मवाले एकराष्ट्रिय है, यह भी नहीं कहा जा सकता है। जैन, बौद्ध, वैदिक आदि धर्म मानने वालों में महान मतभेद स्पष्ट हैं। शास्त्रोक्त ब्राह्मणादि जातियों में भी भेद है, अत एकजातीयता भी राष्ट्रीयता नहीं कही जा सकती।

शास्त्रों में इस देश का नाम भारतवर्ष, अजनाभवर्ष आया है। इसके अंतर्गत ब्रह्मावर्त, आर्यावर्त, कश्मीर, कुरु, कोशल, पांचाल, भद्र, आनर्त आदि अनेक नाम वाले प्रदेश आते हैं। भारतवर्ष का पुराणोक्त परिमाण नौ हज़ार योजन है। इस दृष्टि से इस समय उपलब्ध समस्त पृथ्वी ही भारतवर्ष है। उसके अंतर्गत भरतखंड-प्रदेश ही आजकल भारत नाम से प्रसिद्ध है। सुतरां इस देश में रहने वाला कोई भी व्यक्ति भारतीय या राष्ट्रिय कहा जा सकता है। हां, प्राचीनकाल से इस देश में वर्णाश्रमी ब्राह्मणआदि, जो आजकल हिन्दू कहे जाते हैं, यहां रहते थेय अत देश उनका है। इस देश में उनका स्वत्व, अनेक देवता तथा तीर्थस्थल थे। उनके पूर्वजों के ऐतिहासिक संस्कारों से ओतप्रोत यह देश उनकी बपौती, मिल्कियत है। भले ही वीरभोग्या वसुंधरा के सिद्धांतानुसार जिसने युद्ध करके इस देश को अपने अधिकार में कर लिया, उनका भी इस देश पर कभी-कभी स्वत्व हो गया हो।

भुक्तिप्रमाण के आधार पर भी 12 वर्षपर्यन्त जिस भूमि अथवा संपत्ति पर जिसका अक्षुण्ण अधिकार होता है, वह उसकी हो जाती है, किन्तु यह बात व्यक्तिगत अधिकार के संबंध में ही हो सकती है। किसी बड़ी जाति के अधिकार व प्रश्न उक्त सिद्धांत से ऊंचा है क्योंकि जातिगत संघर्ष तो प्राय सदैव बना रहता है। यद्यपि आज भी कितने ही ग्रामों के नाम पर महाराष्ट्रिय,सरयूपारीण, गुर्जर आदि ब्राह्मणोंएवं मारवाड़ी आदि वैश्यों की जातियां प्रसिद्ध हैं। जैसे कोकंणस्थ, देशस्थ, भोपटकर,पुणताम्बेकर, लाणकर, बड़नगरा,बिसनगरा, डूंगरपुरी, आदि एवं करूआ, चमड़िया, डीडवाना, देसवाली, सेकसरिया, राजगढ़िया आदि है फिर भी आज उनका अधिकार उन-उन गांवों पर नहीं है और संघर्ष भी नहीं,परन्तु भारत पर तो भले ही कभी मुसलमानों का अधिकार हो गया हो, फिर भी संघर्ष सदैव बना रहा। हिन्दू सदा ही अपनी मातृभूमि, अपनी देश की रक्षा के लिए संघर्षरत रहे हैं। किसी के मकान या संपत्ति पर भले ही लुचेरे कुछ समय तक बला अधिकार कर लें और उस भूमि या संपत्ति के स्वामी को हथकड़ी बेड़ी से जकड़कर मुंह बंदकर ताला जड़ दें फिर भी एक अविकृत-मस्तिष्क अलुप्त-स्मृति पुंसत्वसंपन्न व्यक्ति अवश्य सोचता है कि ‘जब भी मझे अवसर एवं सामर्थ्य मिलेगा डाकू को मार भगाकर अपनी मिल्कियत पर अधिकार कर ही लूंगा।

इस दृष्टि से जिस प्रकार किसी साधारण जाति का स्वत्व किसी ग्राम या किसी गृह में होता है उस प्रकार किसी बड़ी जाति का स्वत्व किसी देश पर होता है। जैसे इंग्लैंड की भूमि पर अंग्रेजों का है, फ्रांस पर फ्रांसीसियों का, जर्मनी पर जर्मनों का, अरब पर अरबों का स्वत्व है, वैसे ही हिन्दुस्थान पर हिन्दुओं का स्वत्व है, भारत में वर्णाश्रमियों का स्वत्व है। इसी अभिप्राय से यह देश हिन्दुओं का कहा जा सकता है। उनके तीर्थ, उनके देवमंदिर, उनके पूर्वजों के ऐतिहासिक स्थान इस देश के कोने-कोने में विद्यमान है। अतर यह देश विशिष्ट रूप से हिन्दुओं का है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि यहां अन्य देशों के लोग रह ही नहीं सकते या इस देश के नागरिक नहीं हो सकते।

(पेज-4) वस्तुत आधुनिक राष्ट्रवाद एक अंधविश्वास और प्रतिक्रियामात्र है। भूतपूर्व अमेरिका के राष्ट्रपति विल्सन ने कहा था- मैं स्वशासित राज्य पर वर्षों तक व्याख्यान देता आ रहा हूं किन्तु वहां क्या है, यह कह नहीं सकता। इसी प्रकार पश्चिमी राष्ट्रवादियों की भी बात है। राष्ट्र के विषय में मुख्यत पांच विचार हैं-पंरपरावादी, उदारवादी, जनवादी, साम्यवादी और उग्रराष्ट्रवादी।

परंपरावादी ‘बक’ ने राष्ट्र की पंरपराओं को, जिनमें पूर्वजों की बुद्धिमान सन्निविष्ट हो, आदर की दृष्टि से देखा है। उदारवादी विचारकों में वेन्थम तथा मैजिनी प्रमुख है। बेन्थम ने कहा था- एक राष्ट्र के अंतर्गत वैयक्तिक स्वतंत्रता होनी चाहिए। मनुष्य के प्रकृतिदत्त अधिकारों की सुरक्षा होनी चाहिए। विधिशासन अन्तरराष्ट्रीयता की तरफ झुका हो। एक राष्ट्र में अनेक धर्म, भाषा तथा जाति के लोग रह सकते हैं। आगे उसने कहा कि देशभक्ति विश्वबन्दुत्व से मुधे शत्रु बनाती है तो मैं देशभक्त नहीं हूं। मेजिनी का भी कहना था राष्ट्रवाद का अर्थ अन्ताराष्ट्रिय शत्रुता नहीं है। जनवादी विचारधारा फ्रांसीसी राज्यक्रांति से प्रारंभ होती है, जब जनता का दैवी सिद्दांत उदित हुआ। ‘ओटो वीवर’ ने कहा है- वह राष्ट्र राष्ट्र नहीं है, जहां जनता को आर्थिक, सामाजिक तथा राजनौतिक अधिकार न हो। साम्यवादियों ने तो राष्ट्रवाद की भरपेट निन्दा की है। उनके अनुसार यह एक पूंजीवादी नारा है। पांचवा है-उग्र राष्ट्रवाद। इसके दो रूप हैं। राष्ट्रराज्य(नेशन स्टेट) तथा सांस्कृतिक राज्य। प्रथम का प्रचार ब्रिटेन, फ्रांस स्पेन आदि में तो दूसरे का प्रचार मध्य-यूरोपीय देशों में हुआ। इसके प्रवर्तक हिटलर ने कहा है कि एक जाति एक राष्ट्र। जहां-जहां जर्मन, वहां वहां जर्मनराष्ट्र। मुसोलिनी और जिना ने भी इसी बात को दुहराया। बार्कर ने लार्ड ऐक्टन के बहुराष्ट्रीय विचार का खंडन करते हुए लिखा था कि एक राज्य में एक ही राष्ट्र संभव है। भारत के जनसंघी जैसे राष्ट्रवादी भी इसी उग्र राष्ट्रवाद के अनुयायी हैं। अन्तर यही है कि हिटलर रक्त की प्रधानता स्वीकार करता था और ये निराधार हैं।

शास्त्रीय सिद्धांत तो यह है कि समष्टि-हित का ध्यान रखते हुए एक व्यष्टि अभिमान करना लाभदायक होता है,परन्तु समष्टि हित विरुद्ध होने पर वही व्यष्टि-अभिमान हानिकारक हो जाता है। जैसे व्यक्तिवाद, जातिवाद, समष्टिविरोधी होने पर खतरनाक होते हैं, वैसे ही समष्टिविरुद्ध राष्ट्रवाद हिटलरी राष्ट्रवाद की तरह ही भयानक होता है। वस्तुस्थिति यह है कि जैसे कोई ब्राह्मण होते हुए मानव भी है और मानव होते हुए परमेश्वर की संतान या उसका अंश जीव भी है, वैसे ही उसी परमेश्वर की संतान होने के नाते सभी के साथ समानता एवं भ्रातृता का संबंध है।

(यह पूरा लेख मैंने विचार पीयूष नाम की किताब से लिया है। इसके लेखक धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्री जी महाराज हैं। इसे वेदशास्त्रानुसंधान प्रेस, वाराणसी ने प्रकाशित किया है, लेख काफी लंबा है और आधुनिकवाद खंड के तहत हमारी राष्ट्रियता, जाति और हिन्दुत्व शास्त्रीय दृष्टि में जैसे विषयों पर लिखा गया है। यह लेख भी हमारी राष्ट्रियता- एक समीक्षा के तहत लिखे गए लेख का दूसरा हिस्सा है। पहला लेख आपको इसी वेबसाइट पर कुछ समय पहले दे चुका हूं।)