राष्ट्रीयता की कसौटी

Vichar Piyush 2सावरकर की अवधारणाओं पर कम्युनिस्ट बनाम दक्षिणपंथी बहस तो खूब देखी है लेकिन एक धर्मगुरु के नज़रिये से कभी देखा-पढ़ा नहीं। बनारस में एक स्वामी जी मुझे अपने आश्रम ले गए और विचार पीयूष नाम की मोटी सी किताब दी। कहा कि इसके लेखक धर्मसम्राट स्वामीश्री करपात्रीजी महाराज साधु संत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में हो रही घटनाओं पर खूब राजनीतिक चिन्तन मनन करते थे। हाल ही में हिन्दुस्तान अखबार में छपे  एक लेख से जानकारी मिली कि स्वामीश्री करपात्रीजी महाराज ने रामराज्यपरिषद नाम की पार्टी बनाई थी और आपकी पार्टी से पहली और दूसरी लोकसभा में तीन और दो सांसद भी चुने गए। दिवंगत करपात्रीजी महाराज की यह पुस्तक सारगर्भित है। काफी लगन से उन्होंने राजधर्म से लेकर राष्ट्र भाव, हिन्दुत्व और हिन्दू जातीयता का अध्ययन किया है। यह विषय सबके बस की बात भी नहीं है। बीच में कूदने से पहले हम सबसे अपेक्षा रहती है कि हम सावरकर के विचारों से भी अवगत हों तभी हम पक्ष विपक्ष की दलील को उदार भाव से समझ सकते हैं। बहुत लंबा लेख है। सात सौ पन्नों की किताब से टाइप करने में वक्त लग गया। प्रयास करूंगा कि इसका बाकी का हिस्सा भी टाइप कर उपलब्ध करा दूं। ध्यान देने की बात यह है कि धर्मसम्राट करपात्रीजी महाराज वेद और शास्त्रों के आधार पर सावरकर के कुछ विचारों की आलोचना कर रहे हैं। ऐसी आलोचना मैंने कम देखी है।

देश,जाति,धर्म,संस्कृति और भाषा ये पांचों वस्तुएं यद्यपि आदर की पात्र हैं,फिर भी ये ही राष्ट्रीयता की मूल-वस्तु हों यह आवश्यक नहीं है। अल्पसंख्यकों की समस्या का विचार तभी उठता है,जब एक देश में किसी एक धर्म के लोगों का बाहुल्य हो तथा भिन्न धर्म के लोग अल्पसंख्यक हों। ब्राह्मण,क्षत्रितादि में भी बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक हैं। शैवो-वैष्णवों,हिन्दुओं-जैनों के भेद में भी अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक होने का प्रश्न उठता है। मुसलमानों में भी शिया-सुन्नियों में अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक का प्रश्न उठता है। माना कि किसी देश में जड़वादियों का ही बाहुल्य हो,तब भी वहां अल्ससंख्यकों का प्रश्न उठ सकता है। इंग्लैंड में प्रोटेस्टेंट सम्प्रदाय का ही राज्य होता है। सरकारी कोष से ईसाईयत का प्रचार चलता है। जर्मनी ने अपनी भौगोलिक राष्ट्रीय एकता का प्रयत्न किया। आस्ट्रिया ने(जो कि जर्मनी का ही एक प्रान्त था)प्रशिया, बंवेरिया तथा चेकोस्लोवाकिया आदि के नए राष्ट्र बनाकर जर्मन जाति के पैतृक देश का अपहरण किया था। जर्मनी ने तीव्र प्रयत्न से अपने पैतृक देश पर पुन अधिकार कर लिया अपनी भाषा में दृढता का प्रयत्न किया और यहुदियों को अनार्य कहकर अपने देश से निकाल बाहर किया।

भाषा को भी मुख्य रूप से राष्ट्रीयता का आधार कहा जाता है। किन्तु भारत में भाषा का भेद आपके मंतव्य के स्पष्टरूप से विरूद्ध है। आपका यह भी कहना है कि हमारी भाषा में भेद का बोधक कोई शब्द ही नहीं है,आश्चर्य की बात है। भारतीय दर्शनों के अनुसार धर्म या लक्षण स्वयं ही भेदक होते हैं। वैशेषिक दर्शन ने तो विशेष नाम के अनन्त व्यावर्तक पदार्थ माने ही है।

वैसे अहिन्दुओं के संबंध में यद्यपि संघी कहा करते हैं कि हमारी नीति समता की है किन्तु आप हमारी राष्ट्रीयता के पांचवें प्रकरण में कहते हैं कि हमें पहले ही यह ध्यान रख लेना होगा कि जहांतक राष्ट्र का संबंध है,जो देश,जाति,धर्म,संस्कृति और भाषा,इन पांच सीमाओं के बाहर है,वे राष्ट्रीय जीवन में तबतक स्थान नहीं प्राप्त कर सकते,जबतक अपने भेदभावों की तिलांजलि देकर वे राष्ट्र के धर्म,संसृति और भाषा को ग्रहण नहीं कर लेते तथा राष्ट्रिय जाति में पूर्णरूप में विलीन नहीं हो जाते। जबतक वे किसी भी प्रकार के अपने जातीय,धार्मिक तथा सांस्कृतिक भेदों को रखे हुए हैं वे विदेशी ही हैं चाहे वे राष्ट्र के मित्र हों या शत्रु। सभी प्राचीन राष्ट्रों में, जिनका राष्ट्रिय जीवन महायुद्ध के पहले भी पूर्ण विकसित था, यही दृष्टिकोण स्वीकृत है। यद्यपि वे राष्ट्र धार्मिक सहनशीलता का व्यवहार करते हैं, तो भी आगन्तुकों को राजधर्म के रूप में राष्ट्रिय धर्म स्वीकार करना पड़ता है, राष्ट्रिय समाज में अभिन्न रूप से सम्मिलित हो जाना पड़ता है। राष्ट्र के साथ एकाकार हो जाना पड़ता है। आगन्तुकों को स्वभावत ही मुक्य निवासियों के समूह में-राष्ट्रिय जाति में- उसकी संस्कृति एवं भाषा को स्वीकार कर, उसकी महत्वकांक्षाओं में भाग बंटाकर, अपने विभिन्न अस्तित्व की संपूर्ण चेतना को खोकर तथा अपने विदेशी मूल को भूलकर एकरूप हो जाना पड़ता है। अन्यथा उन्हें बाहरी जनों की भांति रहना पड़ता है तथा वे किसी भी प्रकास के विशेष संरक्षण के पात्र भी नहीं समझे जाते।

“किसी स्वत्व एवं अधिकारों की बात तो दूर रही। वहां विदेशी समूहों के लिए दो ही मार्ग खुले हैं- या तो राष्ट्रिय जाति में विलीन हो जायें तथा उसकी संस्कृति ग्रहण कर लें अथवा जाति की इच्छा के अधीन बसते रहें। यही है तर्कयुक्त ठीक-ठीक हल। हिन्दुस्थान में या तो विदेशी जातियों को अवश्य ही हिन्दू-संस्कृति और भाषा ग्रहण कर लेनी चाहिए, हिन्दू-धर्म का सम्मान करना सीखना चाहिए,हिन्दू-जाति, संस्कृति एवं हिन्दू-राष्ट्र को गौरवान्वित करने के अतिरिक्त कोई भाव ह्रदय में नहीं रखना चाहिए। युगों से चली आयी परंपराओं के प्रति असहनशीलता एवं अकृतज्ञता का अपना भाव त्यागना आवश्यक नहीं, वरन उसके प्रति प्रेम, श्रद्धा का निश्चित भाव भी धारण करें अर्थात या तो विदेशीयत त्याग करें अथवा पूर्णतया हिन्दू-राष्ट्र के अदीन होकर देश में ठहरें। किसी वस्तु पर उनका अधिकार न होगा, वे किसी विशिष्ट अधिकार के पात्र नहीं, अधिक श्रेष्ठ व्यवहार की बात तो दूर रही , उन्हें नागरिक अधिकार भी नहीं मिलते।“

आप भी हिन्दुस्थान के हिन्दुओं की एक ऐसी अवस्था पर विश्वास करते हैं, जिसने ‘ किसी अविज्ञात समय में में प्राकृत अवस्था छोड़ दो और एक सुव्यवस्थित सजातीय सत्ता प्रारम्भ कर दी।‘ इससे तो यह निष्कर्ष निकलता है कि कभी न किसी हिन्दुस्थान के हिन्दू प्राकृत अवस्था (जंगली अवस्था) और असभ्य अवश्य थे। किन्तु वह बहुत चिरकाल की बात है। आपके अनुसार ‘ वेदादि-साहित्य प्राचीनतम मात्र कहे जा सकते हैं, अनादि-अपौरुषेय नहीं।‘ वे एक उन्नत भावों के संग्रहमात्र हैं। इससे इतना सिद्ध है कि वेद उन्नत भावों का संग्रह है, बहुत प्राचीन है और उनका गौरवपूर्ण अस्तित्व गर्व का विष्य है। परन्तु वेदों की अनादिता, अपौरुषेयता या ईश्वरनिर्मितता आदि आपके मस्तिष्क में नहीं बैठी। वेदों के अतिरिक्त रामायण और महाभारत दोनों को आपने महाकाव्य के रूप में स्मरण किया है। इसी प्रकार गीता को महाभारत का अनश्वर मुकुटमणि कहा है। आपने महाभारत की पैंतालिस सौ या पांच हज़ार वर्ष प्राचीन मानकर यह बतलाया है कि “ वह महाभारत जिस पर एक अत्यन्त सुसंघटित परिष्कृत एवं सुसभ्य समाज का चित्रण करता है जो शक्ति एवं कीर्ति के उच्च शिखर पर था। उसे वह अवस्था प्राप्त करने में कितना समय लगा होगा। इससे हिन्दू जाति की प्राचीनता तो सिद्ध की गयी पर साथ ही यह भी मान लिया गया कि वह मूलत असभ्य थी।“

आपने लोकमान्य की यह क्लपना कि ‘ आर्यों का स्थान उत्तरी ध्रुव था’, सही मानी है। परन्तु उत्तरी ध्रुव को अस्थिर मानकर बताया है कि “ उत्तरी ध्रुव बहुत समय पूर्व पृथ्वी के उस भाग में था, जिसे आज बिहार एवं पड़ीसा कहा जाता है. वहां से वह उत्तर पूर्व को चला गया। ऐसी स्थिति में हिन्दू उत्तरी प्रदेश को छोड़कर हिन्दुस्थान में नहीं आये, किन्तु उत्तरी ध्रुव ही हिन्दुस्तान में हिन्दुओं को छोड़कर प्रवास कर गया।“ आधुनिक भू गर्मशास्त्रियों को उत्तरी ध्रुव का इतनी परिवर्तन कहां तक मान्य है यह बात अलग है। किन्तु श्री संपूर्णानंदजी ने तो ‘आर्यो को आदिदेश’ पुस्तक में लोकमान्य के पक्ष का खंडन कर यही सिद्ध किया है कि ‘वेदों तथा अवेस्ता के आधार पर भारतवर्ष में सप्तसिन्ध प्रदेश ही आर्यो का आदिदेश है।‘ आपने हिन्दू जाति के आदर्शरूप में स्वामी दयानन्द,लोकमान्य तिलक, लाला लाजपतराय, गांधीजी और अरविन्द को रखा है जिनका रामायण-महाभारत की सभ्यता से मेल नहीं खाता, जिनके सिद्धांतों का परस्पर को सामंजस्य नहीं है।

उक्त पुस्तक में आपका कहना है कि “ हमें एक और तो मुसलमानों से और दूसरी ओर अंग्रेजो से युद्ध करना पड़ेगा।“ आपके अनुसार “मुसलमान राष्ट्र के अंग नहीं हो सकते, उन्हें नागरिक अधिकार भी प्राप्त नहीं हो सकता। शत्रु-मित्र,चोर-स्वामियों की एक ऊटपटांग गठरी राष्ट्र नहीं है।“ पुस्तक में फाउलर होलकोम्बे,वर्गेस आदि के आधार पर यह सिद्ध  किया गया है कि “राष्ट्रियता से उस जनसमुदाय का बोध होता है जिसकी जाति,भाषा,धर्म,परंपरा और इतिहास के बन्धन समान हों।“ वर्गेस के अनुसार “राष्ट्र का अर्थ है जनसमुदाय,जिसकी भाषा एवं साहित्य, आचार तथा भले-बुरे का साम्य हो और जो भौगोलिक एकायुक्त देश में रहता हो गाल्पोविक की परिभाषा है कि “सभ्यता की समानता ही राष्ट्र है।“ तथा च भौगोलिक एकतायुक्त देश, जाति, धर्म, संस्कृति, भाषा यह राष्ट्र है। (संस्कृत में ही ऐतिहासिक परंपराओं का अन्तर्भाव है)। भारतीय दृष्टिकोण से राष्ट्रभाव अगले अध्याय में स्पष्ट किया गया है।

“विचार-दर्शन’ में आप यह भी कहते हैं कि मुसलमानों एवं ईसाइयों को चाहिए कि वे अपने आपको हिन्दू कहें और उन्हें हिन्दू परंपरा का अभिमान हो। फिर भी वे प्रभु ईसा या मुहम्मद के उपासनामार्ग पर चलने के लिए स्वतंत्र हैं। किन्तु उपासना के साथ साथ जीवन का संपूर्ण व्यवहार बदलने की आवश्यकता नहीं। व्यक्तिधर्म, कुलधर्म,समाजधर्म भी राष्ट्रधर्म होता है। उपासना-मार्ग परिवर्तन होने से राष्ट्रधर्म या कुलधर्म में परिवर्तन उचित नहीं है। अत मुसमलान, ईसाई अपने नाम राम,कृष्ण,अशोक,प्रताप आदि न रखकर जान,थामस, अली हसन,इब्राहिम आदि क्यों रखते हैं? चर्च या मसजिद में जाने से खून विदेशी नहीं हो सकता।

वस्तुत बाइबिल, कुरान आदि को मानते हुए ईसाइयत एवं इस्लाम के अनुसार चर्च या मसजिद में उपासना करते हुए भी अपने आपको हिन्दू कहना रामदास,कृष्णदास आदि नाम रखना, क्या बुद्धिसंगत है? क्या इसी तरह इंग्लैंड फ्रांस, ईरान,इराक आदि देश भी अपने यहां रहने वाले हिन्दुओं को नहीं कह सकते? क्या वहां के हिन्दू भी विष्णु,राम,कृष्ण,शिव की उपासना करते हुए अपने को ईसाई  या मुसलमान कहें। क्या वे जान, हसन आदि अपना नाम रखें?

आपके संघ के नेता कहते हैं कि “मुसलमान अपना नाम बदल ले, धर्म बदल दें, देश की भाषा का आदर करें, त्योहार एवं छुट्टियां राष्ट्रिय ही मनायें तब वे राष्ट्र में रह सकते हैं।“ स्वाभिमान अवश्य आदरणीय है, फिर भी उसकी एक सीमा होती है। निस्सीम अभिमान के कारण ही हिटलर का विनाश हुआ। हिटलर की आत्म-काहनी पढ़ने पर मालूम पड़ता है कि इन नेताओं पर उसका पूर्ण असर पड़ा है। यदि देश के आधार पर जाति का प्रयोग होता है तो इसमें आपत्ति नहीं होती। जैसे हिन्दी मुसलमान, हिन्दी सिख, हिन्दी ईसाई ऐसे व्यवहार सम्भव हैं। लेकिन जब धर्म के आधार पर जाति का व्यवहार होता है तो हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि अपने धर्मानुसार सवर्था स्वतंत्र जाति के ही रूप में रहेंगे।

इस तरह एक जाति की कल्पना की जाती है, वह असैद्धान्तिक होने के साथ अव्यावहारिक भी है। जर्मनी जैसी जातीय क्रांति केवल अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणापत्र के विरूद्ध ही नहीं, प्रत्युत विश्व में फैले हिन्दुओं के विनाश का कारण भी होगी। साथ ही देश में एक जाति की सम्भावना नहीं हो सकती। लेनिन ने समस्त  रूस को एक मार्क्सीय स्तर पर संघटित करना चाहा। यूक्रेन की राष्ट्रियता का विनाश करना चाहा। लेकिन परिणाय यह हुआ कि रूसी गणराज्य की प्रत्येक इकाई को राष्ट्रियता के रूप में माना गया। यूक्रेन की राष्ट्रियता के सम्मुख उसे घुटने टेक देने पड़े। अतएव राष्ट्रियता का तात्पर्य एकजाति से न समझना चाहिए।  ( To be continued)