चंपारण का मददगार- पीर मुह्म्मद मूनीस

Pir Muhammad Munish 1पीर मुहम्मद मूनिस अपने संदेहास्पद साहित्य के ज़रिये चंपारण जैसे बिहार के पीड़ित क्षेत्र से देश दुनिया को अवगत कराने वाला और मिस्टर गांधी को चंपारण आने के लिए प्रेरित करने वाला ख़तरनाक और बदमाश पत्रकार था।” ( British document)
लिखने पढ़ने के दौर में कुछ पल ऐसे सभी पाठकों के जीवन में आते हैं जब वो पढ़ते पढ़ते उसका हिस्सा होने लगता है। उसके रोएं खड़े हो जाते हैं। उस दौर में लौट जाता है या किसी तरह उस विरासत की ज़मीन का एक टुकड़ा होने का गौरव महसूस करने लगता है। शुक्रिया श्रीकांत जी पीर मुह्म्मद मूनिस से मिलवाने के लिए। आपकी कलम के ज़रिये ही चंपारण सत्याग्रह की इस बेहद महत्वपूर्ण कड़ी के बारे में जान सका और पढ़ सका। मूनीस को जाने बिना चंपारण की राजनीतिक ज़मीन पर खड़ा कोई भी व्यक्ति सांसद-विधायक तो हो सकता है मगर चंपारण के जानने का अधिकारी या उत्तराधिकारी नहीं। मैं चंपारण का हूं और पीर मुहम्मद मूनिस को नहीं जानता था। निश्चित रूप से चंपारण के बारे में कुछ नहीं जानता था। लेकिन मूनिस को जानना चंपारण के होने या न होने से कोई ताल्लुक नहीं रखता है। इतिहास ने बहुत नाइंसाफी की इस शख्स के साथ जिसने दुनिया के सामने चंपारण को ला खड़ा कर दिया।
“बिहार प्रांत में चंपारण एक ज़िला है। उसके उत्तर में नेपाल, दक्खिन में सारण, पश्चिम में गोरखपुर और पूरब में दरभंगा अवस्थित है। जिले का क्षेत्रफल ३५१५ वर्गमील और मनुष्य संख्या १८ लाख है। यह ज़िला नेपाल की तराई में है। इसमें दो ज़मींदार है जिसमें सबसे प्रभावशाली स्वर्गीय महाराज बेतिया की ज़मींदारी है जिसका राजस्व ३२००००० रुपये सालाना है। स्वर्गीय महाराज के कोई उत्तराधिकारी नहीं रहने के कारण राज्य कोर्ट आफ वार्ड्स के अधीन है। बेतिया राज्य के अंतर्गत ५०-६० नील की कोठियां हैं यूरोपीयन गोरों की है और यही लोग विशेषकर राज्य के गांवों के ठेकेदार हैं। ये लोग अपने अधीन प्रजाओं के खेतों में से बिगहा तीन कट्ठा ज़मीन अपने लिए रखते हैं। जिससे वहां की प्रजा इसे तीन कठिया लगान के नाम से पुकारती है। फी बीघा तीन कट्ठा जमीन नीलहे गोरों की मौरूसी ज़मीन समझी जाती थी। मगर उस तीन कट्ठे ज़मीन को जोतना, कोड़ना और आबाद करना आदि प्रजाओं के सिर पर है।” (चंपारण में अंधेर- १३ मार्च १९१६ में दुखी नाम से प्रताप में प्रकाशित)
“चंपारण में नीलहे गोरों की भरमार है। यों समझिए कि प्रजा के भाग्य विधाता वे ही हैं। उन लोगों ने सरहबेसी नाम का एक कर प्रजा पर लगाया है अर्थात ठहराए हुए कर से प्राय दूना कर लेने की प्रथा जारी की है।” (प्रताप- १६ अप्रैल १९१७)
मूनीस प्रताप अखबार के संवाददाता के रूप में काम कर रहे थे। जिसके संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी थे। मूनीस के लेखों के लिए प्रताप अखबार को भी प्रताड़िता किया जा रहा था। मूनीस ने चंपारण की इस गुलामी को सामने लाने के लिए जेल की सजा भुगती। अपनी नौकरी से बर्खास्त हुए और संपत्ति तक ज़ब्त हो गई। फिर भी मूनीस का चंपारण के लिए लड़ना नहीं था। वे बेतिया के थे और बेतिया राज के स्कूल में नौकरी करते थे। प्रताप अखबार और मूनिस न होते तो दुनिया को पता चलने तक नीलहे गोरे वहां की अठारह लाख जनता पर न जाने कितने कहर बरपा चुके होते। हिन्दू मुस्लिम एकता के हिमायती मूनिस ने अपने वक्त के दंगों की रिपोर्टिंग करते वक्त पंडित और मौलवियों की करतूतों को खूब उजागर किया है। हिन्दी के विकास में उनका योगदान उल्लेखनीय है। वे बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पंद्रहवें अध्यक्ष बनाए गए। आचार्य शिवपूजन सहाय ने पीर मुहम्मद मूनिस व्यक्तित्व व कृतित्व नाम का एक लेख भी लिखा है।
श्रीकांत ने पीर मुहम्मद मूनिस कलम का सत्याग्रही एक किताब लिखी है जिसे प्रभात प्रकाशन ने छापा है। पत्रकारिता के छात्रों को मूनिस के बारे में जानकारी रखनी चाहिए। श्रीकांत लिखते हैं कि मूनीस बिहार में अभियानी पत्रकारिता के जन्मदाता थे। चंपारण के किसान नेता शेख गुलाब आदि के सुझाव पर राज कुमार शुक्ल और पीर मुहम्मद मूनिस लखनऊ गए और गांधी जी से चंपारण चलने का आग्रह किया। लखनऊ पहुंचने के बाद राजकुमार शुक्ल ने पीर मुह्म्मद मूनीस से गांधी जी के नाम पत्र लिखवाया था। मगर इतिहास इस सत्याग्रही को भूल गया। यही वो खत है जिसे पढ़कर गांधी ने चंपारण आने का मन बनाया और वहां से हिन्दुस्तान की मुस्तकबिल का इतिहास बदलने की दिशा में रफ्तार पकड़ लेता है।
गांधी को लिखे पत्र में मूनिस लिखते हैं कि “किस्सा तो सुनते हो औरों का, आज मेरी दासता सुनो। जिस प्रकार भगवान श्रीरामचंद्रजी के चरण स्पर्श से अहिल्या तर गई उसी प्रकार श्रीमान के चंपारण में पैर रखते ही हम १९ लाख प्रजाओं का उद्धार हो जाएगा। “

मूनीस अरबी शब्द है जिसका मतलब है मददगार, साथी, कामरेड। मूनिस पीर मुहम्मद अंसारी का तखल्लुस था। उनका जन्म १८८२ में हुआ और उनकी मृत्यु २४ दिसंबर १९४९ को हुई। शोध अध्ययनों और किताबों के फुटनोटों में अधिक से अधिक एक लाईन लिखकर मूनिस को दफना दिया जाता है। शिवपूजन सहाय ने लिखा है कि अब तो लोग स्वराज मिल जाने के उल्लास में स्वराज की नींव के रोड़ों को ही भूल गए हैं। आज मूनिस जी आंखों से ओझल हो गए हैं पर हिन्दी माता की आंखों में चिरकाल तक बसे रहेंगे। आचार्य शिवपूजन सहाय ने मूनिस पर कई लेख लिखे थे जिसका संग्रह छपवाने के लिए किसी प्रकाशक को भेजा भी मगर १९३४ के भूकंप में सब तबाह हो गया।

तीन साल बाद चंपारण सत्याग्रह के सौ साल हो जाने हैं। हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई के लंबे सफर का यह एक टर्निंग प्वाइंट है। इस किताब को पढ़ते वक्त श्रीकांत का शुक्रिया अदा कीजियेगा। मैंने तो उनके काम को आपके सामने ला दिया है। यकीन मानिये इस लेख को लिखते वक्त बेहद खुशी हो रही है। पीर मुहम्मद मूनीस ज़िंदाबाद, ज़िंदाबाद !