गेस्ट ब्लॉग : अनजानों से संवाद

यह पोस्ट क़स्बा के पाठक शरद अग्रवाल नें लिखा है ।

दिल्ली में पिछले सात सालों से हूँ। मुझे लगता है की शायद संवाद नाम की चीज़ यहाँ के लोगों के बीच से कहीं चली गयी है। फिर भी आज लगा कि नहीं इतनी जल्दी भी सब कुछ नहीं भूल सकता।

पहले जब कभी यात्रा पर जाने का मौका मिलता था तो आस-पास वालों से बातचीत करते हुए वक्त कट जाया करता था। बस और ट्रेन से सफर के दौरान न जाने कितने मित्र बन जाया करते थे। सफर में फिर चाहे बात राजनीति की हो या फ़िल्मी गपशप, आसपास बैठे लोग रस के साथ बतियाते थे। अब इससे विभिन्न धर्मों-जातियों-परम्पराओं वाले हमारे देश के बारे में हमारी जानकारी बढ़ती थी या नहीं वो मैं नहीं जानता लेकिन कम से कम सफर बीतते देर नहीं लगती थी। अखबार किसी एक के पास हो और या कोई गुलशन नंदा का नॉवेल या कोई पत्रिका उसे कंपार्टमेंट में बैठे या बस में आगे-पीछे सीट वाले सब लोग पढ़ ही लिया करते थे।

फिर धीरे-धीरे हमारी जिंदगी में मोबाइल ने घुसपैठ करनी शुरू कर दी और बातचीत का यह अंतराल सिमटने लगा। तकनीक सस्ती हुई और मोबाइल से स्मार्टफोन, लैपटॉप और टैब तक की दूरी हमने कब पार कर ली पता ही नहीं चला। साथ ही ट्रेन और बस में साथ सफर करने वालों के बीच होने वाला वह संवाद भी कहीं लुप्त सा हो गया।

दिल्ली मेट्रो में सफर के दौरान लोग आपको अक्सर कानों में कनखजूरे (हेडफोन) लगाये गाने सुनते मिल जायेंगे। खैर ये व्यक्तिगत पसंद का मामला है। लेकिन कई बार तो मुझे आश्चर्य होता है कि जब साथ सफर करने वाले दोस्तों के झुंड भी आपस में संवाद नहीं कर रहा तो उनसे अनजानों से बात करने की अपेक्षा करना तो बेईमानी ही होगी । इस तरह से अनजान लोगों से संवाद करने के क्या नुकसान हैं वो एक अलग चर्चा का विषय हो सकता है मगर ऐसा प्रतीत होता है की समाज में एक सहज संवाद का जरिया ख़त्म होता जा रहा है।

फिर भी आज के मेट्रो के सफर नें कुछ उम्मीद जगाया है। कॉलेज जाने वाले कुछ लड़के जो साथ में ही खड़े थे उनसे थोड़ी बातचीत हो ही गयी और मेट्रो का सफर इतना बोरिंग भरा नहीं रहा जैसा अमूमन होता है। एक उम्मीद जरूर बंधी की जो बहुत दिनों से लग रहा था वह अभी पूरी तरह नहीं खोया है।

व्यक्तिगत तौर पर लगता है की इस नयी बदलती दुनिया में हम अपनों के पास होने के बावजूद पास वालों से दूर होते जा रहे हैं। एक तरफ हम कम्युनिकेशन एरा में जी रहे हैं और दूसरी तरफ संवाद भी नहीं कर रहे हैं। पता नहीं हम क्या बनना चाहते हैं और क्या बनते जा रहे हैं। शायद एक सतत इंसान बनने से अभी कोसों दूर हैं।

वैसे दिल्ली मेट्रो में जाएँ तो उस उद्घोषक का हिंदी का वह डायलॉग जरूर सुनें जिसमें वो कहता है, “अंजान लोगों से दोस्ती न करें!!” अब उसे कौन बताये दोस्ती अनजान से ही होती है जान-पहचान वाले तो रिश्तेदार बन जाते हैं। कभी खुद से पूछें कि क्या आप अपने सभी दोस्तों को पहले से जानते थे ? मैंने भी थोड़ा नियमों का उल्लंघन करते हुए उसकी बात नहीं मानने का सोंचा है। अब मौका-ए-दस्तूर पाकर बात कर ही लूँगा।