उद्धव ठाकरे की बातें अनसुनी क्यों रह जाती हैं

“बाक़ी सब तो मेमने हो गए, मगर हम अभी तक शेर हैं।“ शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपनी राजनीति नहीं बदली है बल्कि वे एक आवाज़ वाले नेता भी नहीं हैं। बीजेपी की सहयोगी दलों के नेताओं में अकेले उद्धव ठाकरे हैं जो उसकी नीतियों की आलोचना बीजेपी के विरोधी दलों से ज्यादा करते हैं। वे गठबंधन के साथ रहते हुए भी अपनी आवाज़ के साथ लगते हैं। हिन्दुत्व की राजनीति को लेकर शिवसेना और बीजेपी के सुर में ख़ास फर्क नज़र नहीं आता मगर इसे ज़मीन पर उतारने की नीयत को लेकर ठाकरे ख़ुद को बीजेपी से अलग और ऊपर बताते रहते हैं। वे भी कहते हैं कि भारत को हिन्दुत्व राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए और बीफ पर पूरे भारत पर बैन लग जाना चाहिए। किरण रिजीजू का बीफ पर दिये गए बयान पर कहते हैं कि अभी तक बीजेपी ने उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की है।

मैं महाराष्ट्र की राजनीति के बारे में नहीं जानता, हालांकि अब कोशिश कर रहा हूं कि यूपी बिहार की राजनीति पूरी तरह भूल कर जीवन के बाकी हिस्से में दूसरे राज्यों की राजनीति में दिलचस्पी पैदा की जाए ताकि जानने का कुछ तो रोमांच बचा रहे। समझना चाहता हूं कि उद्धव के इन बयानों का क्या मतलब है, उनकी इन बातों को ख़ास जगह क्यों नहीं मिलती है।

आज की राजनीति में उद्धव ठाकरे के बयान अलग से सुनाई देते हैं। शिवसेना का अपना एक चरित्र है और छवि भी है। भीतर से कितना बदलाव हुआ है, मैं नहीं जानता। लेकिन बीच-बीच उद्धव ठाकरे यह बताते रहते हैं कि वे अभी एन डी ए में होते हुए राम विलास पासवान नहीं हुए हैं, अनुप्रिया पटेल नहीं हुए हैं, सुखबीर बादल नहीं हुए हैं, वे अभी भी उद्धव ठाकरे हैं और बचे हुए हैं। गठबंधन में रहते हुए सामने से प्रधानमंत्री की आलोचना कर देने का साहस तो अब बीजेपी में किसी में न है, न होगा लेकिन उद्धव ठाकरे एन डी ए में विपक्ष की आवाज़ बनते जा रहे हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना के नेता की तरह बोलते हैं मगर लोकंतत्र के सवाल पर वे सिर्फ शिवसेना या एन डी ए के सहयोगी के तौर पर बोलने की खानापूर्ति नहीं करते हैं। उद्धव ठाकरे के इस पहलू ने मुझे प्रभावित किया है।

आज की तारीख में कौन ऐसा नेता है जो बीजेपी के साथ सरकार में रहते हुए भी उसके अवतारी नेता के ख़िलाफ़ बोल सकता है। सामना में उद्धव ने कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी सत्ता का केंद्रीकरण करते जा रहे हैं। राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद पंचायतों को जो स्वायत्तता दी थी, वो प्रधानमंत्री मोदी ने ले ली है। अगर सरकार इसी बात से चलेगी कि प्रधानमंत्री की मर्ज़ी क्या है तो सोचना चाहिए कि क्या वाकई भारत में लोकंतत्र है। लोगों के मत का तो कोई मोल ही नहीं है।

क्या उद्धव भी लिबरल या लेफ्ट की आवाज़ बोलने लगे हैं? उद्धव को क्यों तानाशाही और आपातकाल की आशंका दिख रही है? मौजूदा राजनीति में विपक्षी नेता से मिलिये, उनके भीतर डर और दहशत का आलम दिखेगा। अमित शाह का नाम आते ही उनके पसीने छूटने लगते हैं। वो डर से इतना घबराए हुए हैं कि किसी तरह खुद को बीजेपी के प्रति समर्पित कर देने का बहाना ठूंढ रहे हैं। शायद अमित शाह की तरह मेहनत भी नहीं करना चाहते। डर के अलावा उनके भीतर लालसा भी है। अमित शाह के अथक परिश्रम से तैयार बीजेपी की सफलता का लाभ उठाने का भी यह अच्छा मौका है। बीजेपी से लड़ने के लिए इतना कुछ दांव पर लगाने से अच्छा है कि उसकी मेहनत का फल चख लिया जाए। कई नेता इस भाव से शाह के बुलावे का इंतज़ार भी कर रहे हैं। उद्धव ठाकरे को डर क्यों नहीं लगता है? वो तो बीजेपी के साथ ज़माने से हैं, फिर भी बीजेपी के ख़िलाफ़ वे किसी से भी ज़्यादा खुलकर बोल देते हैं। सामना को दिए इंटरव्यू में कहा है कि सरकार के विज्ञापनों को देखकर लगता है कि सब कुछ अच्छा ही अच्छा है। किसी को हकीकत की भी जांच करनी चाहिए। नोटबंदी और जी एस टी की आलोचना करते हैं। कहते हैं कि सुधार ज़रूरी है मगर ठहर कर समीक्षा कर लेने में कोई बुराई नहीं है।

मार्च 2016 में जब उत्तराखंड की सरकार बर्खास्त हुई थी तब भी उद्धव ठाकरे ने खुलकर कहा था कि वहां जो हो रहा है वो लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। बाद में अदालत में केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन लगाने के कारणों को साबित भी नहीं कर पाई। उद्धव ने तब साफ साफ कहा था कि लोकतंत्र के सवालों का हल लोकतांत्रिक तरीकों से ही किया जाना चाहिए। एक ही दल की सत्ता की आकांक्षा तानाशाही और आपातकाल से भी ख़तरनाक है। जब दिल्ली की कैबिनेट का फैसला लिया तो सेना का ही मंत्री शामिल नहीं हुआ।

क्या यह कोई नए उद्धव ठाकरे हैं? क्या इस पर आपने अमित शाह या किसी केंद्रीय मंत्री का तुरंत आया हुई कोई ट्वीट याद है, कोई बयान याद है? यही बयान कोई कांग्रेसी दे दे तो बीजेपी के प्रति समर्पित चैनलों ने हाहाकार मचा दिया होता। इस वक्त विपक्ष से ऐसी आवाज़ें आनी चाहिए थीं मगर उसके भीतर आयकर विभाग और सीबीआई का भय बैठ गया है। क्या शिवसेना को इन विभागों का डर नहीं? क्या शिवसेना यह देखने लगी है कि बीजेपी की आक्रामकता का यह दौर सहयोगियों की राजनीति ख़त्म कर उन्हें सहायक बनाने का है?

ऐसा नहीं है कि उद्धव ठाकरे कांग्रेसी हो रहे हैं या अपनी राजनीति बदल रहे हैं। लेकिन जब वे लोकतांत्रिकता की वकालत करते हैं, बचाव करते हैं तब क्या उन्हें सुना जा रहा है? उत्तराखंड में सरकार बर्ख़ास्त करने के वक्त उन्होंने कहा था कि हम कांग्रेस की विचारधारा और भ्रष्ट सरकारों के ख़िलाफ़ रहे हैं लेकिन लोकतांत्रित रूप से चुनी हुई सरकारों को सिर्फ उसी तरीसे से हटाया जाना चिहए। 80 के दशक की कांग्रेस की ग़लतियां दोहराने र इस तरह के कांग्रेसीकरण से देश में अस्थिरता और अराजकता फैलेगी।

प्रधानमंत्री मोदी का नेतृत्व अब एकछतरी हो चला है। उनके प्रभाव से ज़्यादा उनके डर की चर्चा होती है। अभी तक के गठबंधन सरकारों में सहयोगी रोज़ बोला करते थे। इस बार सहयोगी सहायक की भूमिका में है। सबने अपनी राजनीतिक स्वायत्तता समर्पित कर दी है। वे सत्ता में तो हैं मगर उनकी राजनीति समाप्त हो चुकी है। शिवसेना ने अभी तक ख़ुद को बचाए रखा है। वह लगातार संदेश दे रही है कि उसकी राजनीति सहयोगी होने के कारण या नरेंद्र मोदी के लगातार चुनाव जीतते रहने के बाद भी समाप्त नहीं हुई है और न होगी।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फड़णवीस ने कर्ज़ माफ़ी की प्रक्रिया तैयार होने तक क़र्ज़दार किसानों को दस हज़ार की राशि देने का एलान किया था ताकि जल्दी राहत मिले। उद्धव ने कहा है कि उस एलान को एक महीना होने को आया है और अभी तक 2500 से ज़्यादा किसानों को पैसा नहीं मिला है। क़र्ज़ माफ़ी के लिए बैंकों को अभी तक निर्देश तक नहीं दिए गए हैं। यह अराजकता नहीं है तो क्या है। निगम चुनाव के वक्त उद्धव ठाकरे ने कहा था कि सारे गुंडे बीजेपी में जा रहे हैं। मुझे गुंडों की ज़रूरत नहीं है। मेरे पास सैनिक हैं। अगर गुंडे शिवाजी के समय के सिपाही के परिधान मावला पहन लेंगे तो वे सैनिक नहीं हो जाएंगे। उद्धव बीफ बैन की बात भी करते हैं और यह भी कहते हैं कि गाय पर नहीं बात महंगाई पर हो। नोटबंदी के कारण 15 लाख नौकरियां गईं हैं यानी साठ लाख लोग प्रभावित हुए हैं, इस पर बात हो।

उद्धव ठाकरे अपने आप में एक विपक्ष हैं। उनकी पार्टी की राजनीति जिस विचारधारा पर है वही बीजेपी की है, वही संघ की है। ऐसा नहीं है कि उस विचारधारा से उद्धव का झगड़ा हो गया है लेकिन वे अपनी असहमतियों को रखने से डरते नहीं हैं। यह भी सबके सामने है कि मैच रोक देने या सांस्कृतिक कार्यक्रम न होने देने को लेकर शिवसेना की क्या भूमिका रही है मगर तानाशाही, केंद्रीकरण, स्वायत्तता पर हमला, लोकतंत्र की मौत का सवाल भी तो उद्धव ठाकरे उठा रहे हैं। क्या हमारे पास उद्धव ठाकरे के इस पहलू को देखने परखने के लिए कोई फ्रेम है? मीडिया उनके बयान को मोदी को दी हुई चुनौती के रूप में क्यों नहीं लेता। मीडिका का जैसा व्यवहार चीन को लेकर है उसी तरह उद्धव ठाकरे के बयानों को लेकर भी है। शांतिपूर्ण और नज़रअंदाज़ भरा।

यह सिर्फ अंतर्विरोध या विडंबना नहीं है बल्कि एक नेता की अपनी स्वायत्ता की रक्षा करने की स्वाभाविक कोशिश है। अगर विपक्ष का कोई नेता कह दे कि प्रधानमंत्री मोदी केंद्रीकरण कर रहे हैं। हर राज्य में सरकार बनाने की उनकी आक्षांक्षा आपातकाल और तानाशाही से भी ख़तरनाक है, तो बीजेपी के प्रवक्ता तड़ से हमला कर देते। कांग्रेसी नेता यह कह दे तो बीजेपी तुरंत आपातकाल या इंदिरा गांधी या दस जनपथ की याद दिला देती है। उद्धव ठाकरे जब तानाशाही और आपातकाल से भी बड़ा ख़तरा देख रहे हैं, बता रहे हैं तो बीजेपी उन पर हमला नहीं कर पाती।

राम जाने, उद्धव किसके मन की बात कर रहे हैं। अपनी या बीजेपी की!या उनकी भी जो उद्धव की कभी बात नहीं सुनते, कभी नहीं करते। उनके हालिया बयानों को नज़रअंदाज़ करना राजनीति के साथ नाइंसाफी करना होगा। उनके बयानों पर बात तो होनी चाहिए कि किस आधार पर आपको आपातकाल और तानाशाही से भी बड़ा ख़तरा दिख रहा है, आप क्या करने वाले हैं, क्या आप इसका सामना करने के लिए सड़क पर उतरेंगे, जो उतरे हैं उनका साथ देंगे या फिर सिर्फ बयान ही देंगे। मेरे लिए इतना भी अच्छा है कि कोई अच्छी बात कर रहा है। शेर के सामने कह रहा है कि वो भी शेर है। मेमना नहीं!