अंग्रेज़ी से साक्षात्कार- पार्ट वन

उन्नीस सौ नब्बे । मगध एक्सप्रैस से दिल्ली आने से पहले तक अंग्रेज़ी भाषा का मतलब मेरे लिए सिर्फ विषय था । पेपर वन औऱ पेपर टू । क्लास में मैं डब्ल्यूईआरई को वेयर बोलता था । हमारी एक टीचर ने कहा कि वेयर नहीं वर बोलो । बहुत कोशिश करता रहा वर बोलने की । जब बोलना आ गया तो सोचा इसका उपयोग क्या हो सकता है ? भीतर से जवाब मिला छोड़ो वेयर वर होकर तभी सार्थक है जब मैं अंग्रेजी में पास होने लायक हो जाऊं । गणित के अलावा अंग्रेज़ी के दोनों पेपर ऐसे थे जिनकी पिच पर मैं क्लिन बोल्ड हो जाया करता था । पर इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता था । काउ इज़ ए फोर फुटेड एनिमल रट कर काम चल जाता था । गोल्डन पासपोर्ट (कुंजी) में छपे आनस्टी इज़ द बेस्ट पोलिसी रट कर लिख देता था । पास मार्क से एक नंबर कम मिलता था । कोई बात नहीं । वैसे गाइड बुक को भूरे कवर में ही रखा जाता था । ताकि घर आने वाले दोस्तों और मेहमानों को पता न चले कि हम अंग्रेजी और गणित में गाइड पढ़कर पास होते हैं । कुंजी पढ़ने वाले छात्रों की अलग मनोदशा होती है । वह पास तो हो जाता होगा मगर तेज विद्यार्थी की तरह छात्रों के बीच स्वाभिमान से विचरण नहीं कर पाता होगा । शार्टकर्ट तरीके से पास कराने के बाद भी गाइड आपके मन में लंबे समय तक के लिए चोर बिठा देता है । कमज़ोर छात्रों का यह मज़बूत हथियार हमेशा के लिए उन्हें बिखेर देता है ।

पता नहीं बाकी छात्रों को अंग्रेजी कैसे आ गई । मुझे तो प्रिपोज़िशन ने बहुत परेशान किया । इसका पोज़िशन मालूम होता तो शायद अंग्रेजी के प्रोफेसर भीम भंटा राव हो गए होते । नहीं हुए । आर्टिकल और टेन्स ने भी कम अडंगा नहीं डाला । इतने सारे टेन्स और डू, डन, डीड । बाप रे । समझ में नहीं आता था कब डू करें । कब डन हो गया और कब डीड कर दिया। मगर यह तनाव व्यक्तिगत था । तब के माहौल में अंग्रेजी अपनी सार्वभौमिकता के साथ मौजूद नहीं थी । या हमें पता नहीं था कि दुनिया में कहीं अंग्रेजी बोली जाती है । या अंग्रेजी बोलने से बाबू लाट साहब हो जाते हैं । मेरे सारे रिश्तेदार क्लर्क से लेकर एकाध जूनियर इंजीनियर थे । हम इन्हें साहब ही समझते थे मगर किसी को अंग्रेजी नहीं आती थी ।

बहुत मुश्किल से मां से विनती कर एक अंग्रेजी का ट्यूशन कर लिया । कुछ नहीं हुआ । हर गलत ट्रांसलेशन पर एक चांटा । कान उमेठ कर पीठ पर धम्म से एक मुक्का । उन दिनों में बहस नहीं होती थी कि छात्र की पिटाई गलत है और इससे उसका आत्मविश्वास टूट जाता है । दिल्ली आकर हिंदुस्तान टाइम्स के फ्रंट पर एक लड़की की तस्वीर छपी थी जिसे मास्टर ने मारा था । तब लगा कि अच्छा ये गलत भी है । पर इस बहस से पहले न जाने कितने मास्टर कितने रवीश कुमारों की धुनाई कर निकल गए । खैर मास्टर साहब बोलते पास्ट परफेक्ट टेन्स हीं नहीं समझ पाते हो । क्या लिखोगे । एक बहुत प्रसिद्द अनुवाद था । मेरे स्टेशन पहुंचने से पहले गाड़ी जा चुकी थी । अक्सर चाचा इसका ट्रांसलेशन पूछ कर दस लोगों के बीच में आत्मविश्वास का कचरा कर देते थे । पहली बार अहसास हुआ कि मैं अंग्रेजी के कारण गांव जाने से घबराने लगा हूं । गांव पहुंचते ही तब ऐसे अनुवाद प्रकरणों से गांव और शहर की प्रतिभा में तुलना हुआ करती थी । मैं अक्सर फेल हो जाता था । एक बार गोल्डन पासपोर्ट से उसका अनुवाद लिख कर ले गया । रास्ते भर रटता था । नो सूनर हैड आय रिच्‍ड द स्टेशन द ट्रेन हैड लेफ्ट । ऐसा कुछ अनुवाद था । आज भी सही नहीं लिख सकता । बहरहाल उसके बाद भी चाचा जी के सामने नहीं बोल पाया । चाचा के अलावा एक मास्टर जी ने भी परेशान किया । जब भी वह बांध की ढलान से उतरते अपनी सायकिल रोक देते । और ऊंची आवाज़ में बोलने लगते । व्हेन डीड यू कम फ्राम पटना ? व्हाट इज़ योर फादर नेम्स ? यह लाइन ठीक ठीक याद है । घबराहट में इसका जवाब नहीं दे पाता । मिट्टी में सने मेरे बाकी दोस्त बहुत उम्मीद से देखते थे कि शहर में पढ़ता है जवाब दे देगा । मेरी नाकामी से संतुष्ट होकर मास्टर जी अपनी सायकिल बढ़ा देते थे । मैं गांव के अपने घर से तब तक नहीं निकलता था जब तक यह देख न लूं कि मास्टर जी स्कूल के लिए चले गए हैं । अंग्रेजी से घबराहट होने लगी ।

हर गर्मी में गांव न जाने का बहाना करने लगा । मेरा पूरा परिवार गर्मियों में गांव जाकर रहता था । मैं अब शहर में रहने लगा । मैं अंग्रेजी के कारण गांव के लड़कों के सामने कमतर नहीं होना चाहता था । मुझे मेरे गांव से किसी महत्वकांझा ने नहीं बल्कि अंग्रेजी ने अलग कर दिया । इंदिरा गांधी पर गोल्डन पासपोर्ट और भारती गाइड में छपे लेख को मिला कर रट गया । वेयर देयर इज़ अ विल देयर इज़ वे । जहां चाह है वहीं राह है । बहुत कुछ रटता रहा । लेकिन अंग्रेजी सिर्फ इम्तहानों में पास होने वाली भाषा बनी रही । हम अंग्रेजी के क्लास में वर्ड्सवर्थ की कविताएं हिंदी में समझा करते थे । शी ड्वेल्ट अमंग्स्ट अनट्रोडन वे । लुसी निर्जन रास्तों के बीच रहती है । ठीक ठीक याद नहीं मगर कुछ ऐसे ही पढ़ाया जाता था । सिर्फ इम्तहान खालिस अंग्रेजी में होते थे ।

तभी ख्याल आया टाइम्स आफ इंडिया लेने का । देश के कई घरों में पहली बार यह अखबार ख़बरों के लिए नहीं मंगाया गया । बल्कि अंग्रेजी सीखने के लिए मंगाया गया । पढ़ते रहने से आदत बनेगी । किसी ने कहा संपादकीय पढ़ो । हर संपादकीय को अंडरलाइन कर पढ़ा । डिक्शनरी लेकर अखबार पढ़ता था । मगर दोस्तों अखबार तो आ गया लेकिन अंग्रेजी नहीं आई । पटना शहर में जब नवभारत टाइम्स बंद हुआ तो मेरे एक टीचर ने कहा था । हिंदी का ज़माना चला गया । उल्लू तुम्हे अंग्रेजी सीखनी ही पड़ेगी । उसके बाद से टाइम्स आफ इंडिया को जब भी देखता घबरा जाता था । अंग्रेजी हिंदी को बंद कर देगी तो मेरा क्या होगा ? धर्मयुग दिनमान पहले ही बंद हो चुके थे । पड़ोस में चर्चा होने लगी थी कि अंग्रेजी सीखनी चाहिए । आगे की कहानी अगली कई किश्तों में लिखूंगा । जारी…..

जितेंद्र चौधरी ने भी टिप्पणी में अंग्रेजी से जुड़ा एक संस्मरण लिखा है । पढ़ना आवश्यक है